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Kartavya Review: हमारा कर्तव्य है कि ऐसी पुराने टाइप की आउटडेटिड फिल्म से दूर रहें, सैफ का कमाल काम



ये फिल्म 3 साल से लटकी हुई थी और देखकर समझ आता है क्यों, वर्ना जिस फिल्म में सैफ अली खान हों वो थिएटर का मुंह तो देख ही सकती थी. इस फिल्म की हाइप सौरभ द्विवेदी की वजह से भी थी लेकिन वो इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी निकले. इतना हल्का विलेन हमने शायद ही देखा हो. ये फिल्म ऐसी कहानी पर बनी है जिसपर ना जाने कितनी फिल्में और सीरीज बन चुकी हैं, फिर इसे क्यों बनाया गया?  नेटफ्लिक्स ने इसे क्या खरीदा? ये समझ से परे है. जाहिर है शाहरुख खान के रेड चिलीज का नाम इससे जुड़ गया तो इसे रिलीज मिल गई वर्ना तो ऐसी फिल्में बनाना कतई फिल्म मेकर्स का कर्तव्य नहीं है.

कहानी
ये कहानी है एक ईमानदार पुलिस अफसर पवन की जिसका किरदार सैफ अली खान ने निभाया है. सौरभ द्विवेदी एक भ्रष्ट नेता के रोल में है जिसकी लोग पूजा करते हैं, लेकिन वो उनके बच्चों को गलत काम के लिए इस्तेमाल करता है. पवन का भाई एक दूसरी जात की लड़की से प्यार करता है और फिर ड्यूटी, परिवार , हॉनर किलिंग,वही सब होता है जो ना जाने कितने हजारों बार हम देख चुके हैं.

कैसी है फिल्म
ये फिल्म बिल्कुल पुराने टाइप की है, अगर ये 20 साल पहले आती तो अच्छी लगती, मजा आता है लेकिन अब ये आउटडेटिड से भी आउटडेटिड लगती है. ऐसा लगता है कि इसे क्यों बनाया गया. शाहरुख जैसे प्रोड्यूसर और सैफ जैसे एक्टर होने के बाद आप उम्मीद करते हैं कि कुछ नया होगा, कुछ अलग होगा लेकिन ऐसा नहीं होता. फिल्म काफी ज्यादा प्रिडिक्टेबल है. आपको पता है कि आगे क्या होगा, और कैसे होगा ये भी कोई कमाल तरीके से नहीं होता. फिल्म करीब 2 घंटे की है लेकिन कहीं आप फिल्म से कनेक्ट नहीं होते. कहीं आपको  कोई थ्रिल महसूस नहीं होता, आप इमोशनल नहीं होते, फिल्म बस चलती रहती है और खत्म हो जाती है, और आपको लगता है आपके 2 घंटे बर्बाद हो गए, ये था नेटफ्किल्स एंड चिल.

एक्टिंग
सैफ अली खान ने कमाल का काम किया है, इस देसी किरदार में सैफ जमे हैं. सैफ जैसा शख्स वैसे भी जब देसी किरदार निभाता है तो उनमें एक अलग ही स्वैग दिखता है और यहां भी वो दिखा लेकिन अकेले सैफ क्या ही कर लेते. कहानी बेहतर होती तो सैफ को इस फिल्म से काफी फायदा होता जैसे ओमकारा से हुआ था. सौरभ द्विवेदी जब पहली बार फ्रेम में आते हैं तो ऐसा लगता है कि वो अभी दर्शकों के बीच एक इंटरव्यू करेंगे. उनका वही अंदाज नजर आता है, वो विलेन लगते ही नहीं,और एक्टिंग शायद उनका जोन भी नहीं है. रसिका दुग्गल ने अच्छा काफी अच्छा काम किया है. संजय मिश्रा बढ़िया हैं,जाकिर हुसैन अच्छे लगते हैं, मनीष चौधरी काफी इम्प्रेस करते हैं.

राइटिंग और डायरेक्शन
पुलकित ने ये कहानी लिखी और डायरेक्ट की है , वो भक्षक बना चुके हैं, उनसे उम्मीदें काफी ज्यादा थी लेकिन यहां वो निराश कर गए. कहानी में कुछ नयापन नहीं है, उन्हें समझना चाहिए था कि दर्शक ऐसी कहानी क्यों देखेंगे? उम्मीद है कि आगे वो अपने सिनेमा में कुछ और नया करेंगे.

कुल मिलाकर सैफ के परफॉर्मेंस के लिए देख लीजिए वर्ना नहीं

रेटिंग- 2 स्टार्स



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