हस्तिनापुर की सभा में शकुनि ने अपनी चालाकी से युधिष्ठिर को बार बार द्यूत खेलने के लिए उकसाया. धर्मराज जानते थे कि जुआ उचित नहीं, फिर भी राजधर्म और सभा की मर्यादा के कारण उन्होंने खेल स्वीकार किया. यहीं से महाभारत के सबसे दुखद अध्याय की शुरुआत हुई, जिसने पूरे कुरुवंश का भविष्य बदल दिया.

शकुनि के छलपूर्ण पासों के सामने युधिष्ठिर एक एक करके अपना स्वर्ण, रत्न, हाथी, घोड़े, रथ, सेना और समस्त राज्य हारते चले गए. हर बार उन्हें उम्मीद रहती कि अगली बाजी जीत जाएंगे, लेकिन छल के सामने सत्य और सरलता लगातार पराजित होती रही. सभा मौन रही और अधर्म बढ़ता गया.

जब समस्त धन समाप्त हो गया, तब युधिष्ठिर ने नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम को भी दांव पर लगा दिया. शकुनि की धूर्तता के कारण सभी पांडव हार गए. यह केवल हार नहीं थी, बल्कि रिश्तों, विश्वास और परिवार की मर्यादा पर लगा सबसे बड़ा आघात था.

भाइयों के बाद युधिष्ठिर ने स्वयं को भी दांव पर लगा दिया और हार गए. अब वे स्वतंत्र राजा नहीं, बल्कि दास घोषित कर दिए गए. इसके बाद भी शकुनि नहीं रुका. उसने युधिष्ठिर को एक और दांव खेलने के लिए उकसाया, जिससे इतिहास का सबसे शर्मनाक प्रसंग सामने आया.

शकुनि के बहकावे में आकर युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया. यह निर्णय धर्म, न्याय और नारी सम्मान के विरुद्ध था. द्रौपदी को सभा में बुलाया गया, जहाँ उन्होंने प्रश्न उठाया कि जो स्वयं हार चुका हो, क्या उसे किसी और को दांव पर लगाने का अधिकार है?

सभा में विदुर ने धृतराष्ट्र को बार बार चेताया कि अधर्म का साथ देना पूरे कुरुवंश के विनाश का कारण बनेगा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि अन्याय को रोकना ही सच्चा राजधर्म है. लेकिन धृतराष्ट्र ने पुत्रमोह में सत्य को अनदेखा किया और यही निर्णय आगे चलकर महाभारत युद्ध का कारण बना.

लोभ, अहंकार और गलत संगति सबसे बुद्धिमान व्यक्ति को भी पतन की ओर ले जा सकती है. धर्म से किया गया छोटा सा समझौता भी बड़े विनाश का कारण बनता है. सत्य, न्याय और विवेक का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि अंततः जीत उसी की होती है जो धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है.
Published at : 21 Jul 2026 06:05 AM (IST)
