भारत और पाकिस्तान को आजाद हुए करीब 80 साल हो चुके हैं, लेकिन दोनों देशों के आम लोगों के बीच एक-दूसरे को लेकर नकारात्मक सोच आज भी उतनी ही गहरी है. अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के ताजा सर्वे ने इस कड़वी हकीकत को एक बार फिर उजागर किया है. दोनों तरफ से करीब 8 से 9 में से 10 लोग एक-दूसरे को दुश्मन नजर से देखते हैं. आखिर दोनों देशों की एक-दूसरे को लेकर बदगुमानी खत्म क्यों नहीं होती…
प्यू सर्वे में क्या आया?
प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे फरवरी-अप्रैल 2026 के दौरान 3,566 भारतीय वयस्कों से फेस-टू-फेस इंटरव्यू के आधार पर किया गया. यह सर्वे 13 भारतीय भाषाओं में कराया गया. पाकिस्तान में यह सर्वे 8 अप्रैल से 7 मई 2026 के बीच 1,039 वयस्कों से 5 पाकिस्तानी भाषाओं में किया गया. इसके मुताबिक,
- भारत को लेकर: 73% पाकिस्तानियों की बेहद खराब राय है. 18% की कुछ हद तक नकारात्मक राय.
- पाकिस्तान को लेकर: 65% भारतीयों की बेहद खराब राय है. 16% की कुछ हद तक नकारात्मक राय.
प्यू रिसर्च के 2013 से अब तक के सर्वेक्षणों में 20% से ज्यादा भारतीयों ने कभी भी पाकिस्तान को लेकर अच्छा रुख नहीं जताया. पाकिस्तान में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय रखने वालों का प्रतिशत सिंगल डिजिट से लेकर एक-तिहाई (33%) के बीच रहा है.
यानी यह नफरत या बदगुमानी कोई नई बात नहीं है. यह पिछले एक दशक से लगातार बनी हुई है.
We ask people in #India and #Pakistan if their government and citizens are committed to good relations with the other side.
The clear pattern is most Indians and Pakistanis only trust their own country. pic.twitter.com/M0Iz8b8mCt
— Pew Research Center (@pewresearch) August 17, 2026
एक-दूसरे के इरादों पर गहरी बदगुमानी
सर्वे की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों देशों के लोग यह मानते हैं कि उनकी अपनी सरकार पड़ोसी से अच्छे संबंध बनाना चाहती है, लेकिन दूसरे देश की सरकार ऐसा नहीं चाहती.
- भारत सरकार को लेकर: 57% भारतीय अपनी सरकार को रिश्ते बेहतर करने की कोशिश वाली मानते हैं, जबकि 65% पाकिस्तानी भारत को प्रतिबद्ध नहीं मानते.
- पाकिस्तान सरकार को लेकर: 61% पाकिस्तानी अपनी सरकार को प्रतिबद्ध मानते हैं, जबकि 51% भारतीय पाकिस्तान को प्रतिबद्ध नहीं मानते.
यानी दोनों तरफ एक-दूसरे के इरादों पर भरोसा नहीं है. यह अविश्वास ही सबसे बड़ी बाधा है.
बदगुमानी क्यों नहीं खत्म होती?
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. ए के पाशा 4 बड़ी वजहें बताते हैं:
1. ‘पीस विद पाकिस्तान’ वाली कमजोर लॉबी
एक जमाना था जब पाकिस्तान में भारत विरोधी भावनाएं बहुत ज्यादा थीं. हमारे देश में एक आकांक्षा थी कि हम रिश्ते ठीक करें. एक जमाने में एक स्ट्रॉन्ग लॉबी होती थी, जो ‘पीस विद पाकिस्तान’ वाली थी. अब वह लॉबी कमजोर हो गई है या दिखाई ही नहीं देती. जो लोग अपना मुकाम छोड़कर आए थे, वो जनरेशन लगभग खत्म है और नई जनरेशन को पाकिस्तान के बारे में कुछ और ही सिखाया गया है.
2. सही राय रखने में लोगों में डर
दोनों देशों के लोग पब्लिक में अपनी सही राय रखने से झिझकते हैं. अगर आप किसी स्कूल या कॉलेज में यूथ के बीच या प्रोफेशनल ग्रुप में जाएंगे तो वहां ज्यादातर लोग वही नैरेटिव बोलेंगे या वही राय रखेंगे, जो देश की होती है. वो अपनी राय नहीं रखेंगे क्योंकि कोई विवाद में नहीं पड़ना चाहता.
यानी देश में चल रहे नैरेटिव ने लोगों की सोच को इतना प्रभावित कर दिया है कि वे अपनी राय भी खुलकर नहीं रख पाते.
3. शांति की बात जंग की बात से ज्यादा मुश्किल
आज हमारे दोनों देशों में अमन और शांति की बात करना, जंग की बात करने से ज्यादा मुश्किल हो गया है. आम लोगों के मन में एक-दूसरे के खिलाफ दुश्मनी पैदा कर दी गई है. आजकल हम लोकतंत्र के रूप में उतने अपरिपक्व लग रहे हैं, जितना पाकिस्तान है.
4. व्यापार के समर्थक, लेकिन दोस्त नहीं
पाकिस्तानी छोटे कारोबारी और व्यापारी दोनों देशों के बीच व्यापार शुरू करने के पैरोकार हैं. छोटे कारोबारी और व्यापारियों से जब बात होती है तो वो यह नहीं कहते कि भारत हमारा दोस्त है, लेकिन वो यह मानते हैं कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर तरक्की करनी है तो दोनों देशों को बातचीत करनी होगी और ट्रेड बढ़ानी होगी.
चीन को लेकर भारत-पाकिस्तान में जमीन-आसमान का फर्क
सर्वे में चीन को लेकर दोनों देशों की राय में बहुत बड़ा फर्क सामने आया:
- 21% भारतीय मानते हैं कि चीन सबसे बड़ा खतरा है.
- 75% पाकिस्तानी मानते हैं कि चीन सबसे अहम सहयोगी है.
पाकिस्तान को सबसे ज्यादा समर्थन चीन से मिला है, चाहे वो UN में वीटो की बात हो, आर्थिक समर्थन की बात या टेक्नोलॉजी के सपोर्ट की बात हो. हालांकि, चीन को लेकर भारत की चिंता नई नहीं है. नेहरू के समय भी भारत सरकार, चीन को एक बड़ी चुनौती मानती थी.
फॉरेन एक्सपर्ट और BHU के प्रोफेसर डॉ. प्रियांकर उपाध्याय कहते हैं कि भारत की आजादी के बाद पहली इंस्पेक्टर जनरल की कॉन्फ्रेंस में पंडित नेहरू ने कहा था कि हमको ऐसा लगता हो कि हमारे लिए बड़ा चैलेंज पाकिस्तान है, लेकिन सच्चाई में हमारे लिए बड़ा चैलेंज चीन है. भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच चीन कोई फैक्टर नहीं है.
अमेरिका को लेकर भी अलग-अलग नजरिए
सर्वे के मुताबिक, भारत रूस और फिर अमेरिका पर सबसे ज्यादा भरोसा करता है.
क्या कभी बदल सकती है यह तस्वीर?
प्यू सर्वे के नतीजे साफ बताते हैं कि भारत-पाकिस्तान के बीच आपसी नफरत और बदगुमानी कोई नई बात नहीं है. यह पिछले एक दशक से लगातार बनी हुई है.
91% पाकिस्तानी और 78% भारतीय एक-दूसरे को नकारात्मक नजर से देखते हैं. दोनों तरफ एक-दूसरे के इरादों पर भरोसा नहीं है. देशों में चल रहे नैरेटिव, ‘पीस विद पाकिस्तान’ वाली कमजोर लॉबी और हर बार शांति की उम्मीद को तोड़ने वाली घटनाएं मिलकर नकारात्मक माहौल बनाती हैं. अब अमन और शांति की बात करना जंग की बात करने से ज्यादा मुश्किल हो गया है.
हालांकि, राहत की बात यह है कि पाकिस्तानी व्यापारी और कारोबारी आर्थिक सहयोग के पक्ष में हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि व्यापार और आर्थिक संबंध ही वह रास्ता हो सकते हैं जो दोनों देशों के बीच की दीवार को कम कर सकें.
