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Women Reservation Bill: लोकसभा की 543 सीटों में क्यों नहीं लागू हो सकता महिला आरक्षण, सरकार और विपक्ष के क्या हैं दावे?


भारत की संसद में महिला आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक विवाद सामने आया है. नरेंद्र मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहली बार कोई विधेयक लोकसभा में गिर गया, जब संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पास नहीं हो सका. इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब 33% महिला आरक्षण पहले से कानून बन चुका है, तो इसे मौजूदा 543 सीटों वाली लोकसभा में तुरंत लागू क्यों नहीं किया जा सकता?

क्या था सरकार का प्लान और क्यों हुआ फेल
सरकार का प्रस्ताव था कि फिलहाल लोकसभा की सीटों को 50% बढ़ाकर 543 से 816 किया जाए और भविष्य में इसे 850 तक ले जाया जा सके. इन नई सीटों में से एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी थीं.

लेकिन विपक्ष ने इस योजना का जोरदार विरोध किया. उनका कहना था कि पुरानी जनगणना (2011) के आधार पर परिसीमन (Delimitation) करना और सीटें बढ़ाना जल्दबाजी है, जबकि कई बड़े सवाल अब भी अनसुलझे हैं.

महिला आरक्षण पहले से कानून, फिर भी लागू क्यों नहीं
महिलाओं के लिए 33% आरक्षण पहले ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत सितंबर 2023 में संसद से सर्वसम्मति से पास हो चुका है. इसे 16 अप्रैल 2026 को आधिकारिक गजट में भी अधिसूचित कर दिया गया. यह कानून संविधान के अनुच्छेद 334A का हिस्सा है. लेकिन इसके बावजूद इसे अभी लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें एक स्पष्ट शर्त जोड़ी गई है.

जनगणना और परिसीमन की शर्त बनी सबसे बड़ी बाधा
इस कानून के अनुसार, महिला आरक्षण लागू करने से पहले तीन चरण जरूरी हैं- पहले नई जनगणना पूरी हो,फिर परिसीमन हो, और उसके बाद ही आरक्षण लागू हो सके. चूंकि ताजा जनगणना अभी शुरू ही हुई है, इसलिए मौजूदा समयसीमा के अनुसार यह आरक्षण 2034 से पहले लागू होना मुश्किल माना जा रहा है.

विपक्ष का आरोप- यह शर्त हमने नहीं मांगी
सोनिया गांधी ने अप्रैल 2026 में लिखे एक लेख में कहा कि यह शर्त विपक्ष ने नहीं रखी थी. उन्होंने बताया कि मल्लिकार्जुन खरगे ने तो 2024 के लोकसभा चुनाव से ही महिला आरक्षण लागू करने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने इसे नहीं माना.

अब 2011 जनगणना के आधार पर बदलाव की कोशिश

सरकार ने 2026 में प्रस्ताव दिया कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाए. लेकिन विपक्ष ने इसे दो कारणों से खारिज कर दिया. पहला, क्षेत्रीय असमानता का मुद्दा पहले सुलझाया जाए और दूसरा, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए राजनीतिक आरक्षण तय किया जाए.

OBC आरक्षण बना सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा
इस पूरे विवाद के पीछे एक बड़ा संवैधानिक खालीपन भी है- OBC वर्ग को संसद और विधानसभाओं में कोई राजनीतिक आरक्षण नहीं मिला है. जहां SC और ST को अनुच्छेद 330 और 332 के तहत आरक्षण मिलता है, वहीं OBC के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. अखिलेश यादव ने संसद में आरोप लगाया कि सरकार जातिगत जनगणना से बच रही है क्योंकि इससे आरक्षण की मांग और बढ़ेगी.

जातिगत जनगणना से बदलेगा पूरा समीकरण
2026 की जनगणना में लगभग 100 साल बाद पहली बार सभी वर्गों की जातिगत गिनती की जा रही है. इसके नतीजे अगले दो वर्षों में आने की उम्मीद है. इसके बाद ही OBC आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े फैसलों पर गंभीर चर्चा हो पाएगी.

1996 से अटका है महिला आरक्षण का मुद्दा
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है. पहला विधेयक 1996 में लाया गया था, लेकिन बार-बार संसद में सहमति न बनने के कारण यह अटकता रहा. 2008 में लाया गया विधेयक 2010 में राज्यसभा से पास हुआ, लेकिन लोकसभा में कभी पेश नहीं हो सका.

अभी क्या है स्थिति
फिलहाल 2011 जनगणना के आधार पर लाए गए तीनों विधेयक लोकसभा में गिर चुके हैं. 2023 का महिला आरक्षण कानून अब भी लागू है, लेकिन जनगणना और परिसीमन की शर्त के कारण इसे लागू नहीं किया जा सकता. 



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