गुजरात के ऐतिहासिक शहर भरूच में स्थित लगभग 700 साल पुरानी जुमा मस्जिद इन दिनों एक बड़े धार्मिक और कानूनी विवाद के केंद्र में है. इस प्राचीन इमारत के मूल स्वरूप को लेकर शुरू हुआ विवाद अब अदालत की दहलीज तक जा पहुंचा है. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर देश में ऐतिहासिक स्मारकों के धार्मिक अतीत और स्वामित्व से जुड़े दावों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आइए इस पूरे विवाद, इसके कोर्ट तक पहुंचने की वजह और इससे जुड़े सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं.
मामला कोर्ट क्यों पहुंचा?
भरूच जामा मस्जिद का विवाद हाल ही में तब और गहरा गया जब सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों से यह दावा किया गया कि इस प्राचीन मस्जिद के तहखाने और परिसर में हिंदू देवी-देवताओं और जैन तीर्थंकरों की प्राचीन मूर्तियां और नक्काशीदार अवशेष मौजूद हैं.
जैन पक्ष की याचिका: एडवोकेट हरिशंकर जैन, राहुल दीवान और अन्य याचिकाकर्ताओं ने गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. याचिकाकर्ताओं ने खुद को जैन-हिंदू समुदाय का अनुयायी बताते हुए दावा किया कि यह जामा मस्जिद असल में एक प्राचीन ‘जैन विहार’ या मंदिर है, जो जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ को समर्पित था.
याचिका में मांग की गई कि इस स्थल के ऐतिहासिक स्वरूप की वैज्ञानिक जांच कराई जाए और जैन श्रद्धालुओं को यहां पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी जाए.
अदालत का रुख
गुजरात हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा. याचिकाकर्ताओं ने मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध ‘भोजशाला’ मामले के संदर्भों का हवाला देते हुए ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा और मूल स्वरूप की बहाली की गुहार लगाई है.
क्या यह मस्जिद कभी मंदिर या जैन विहार थी?
इस सवाल पर दो पूरी तरह से विरोधी और आमने-सामने के दावे हैं. हिंदू और जैन पक्षों का दावा है इसके पक्ष में है. याचिकाकर्ताओं और विभिन्न हिंदू-जैन संगठनों का तर्क है कि इस इमारत के खंभों, दीवारों और वास्तुकला में प्राचीन भारतीय मंदिरों और जैन स्मारकों जैसी नक्काशी साफ दिखाई देती है.
उनका दावा है कि जब तहखाने और अन्य हिस्सों की जांच की गई, तो वहां विक्रम संवत 1213 (या उससे जुड़े काल) के शिलालेख और प्राचीन मूर्तियां मिलीं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि यह स्थल मूल रूप से एक मंदिर या जैन विहार था, जिसे बाद में तोड़कर या परिवर्तित करके मस्जिद का रूप दिया गया.
मुस्लिम पक्ष और जामा मस्जिद ट्रस्ट का बयान
इस मामले में दूसरी ओर जामा मस्जिद ट्रस्ट और स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने इन सभी दावों को पूरी तरह खारिज किया है. उनका कहना है कि यह एक ऐतिहासिक और स्थापित इस्लामी इबादतगाह है, जहां सदियों से नियमित रूप से जुमे की नमाज और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते आ रहे हैं.
मुस्लिम समुदाय के मुताबिक, इस तरह के दावे केवल सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के इरादे से किए जा रहे हैं. उनका यह भी तर्क है कि यह ढांचा लंबे समय से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में एक आधिकारिक और मान्यता प्राप्त मस्जिद के रूप में दर्ज है.
ASI और प्रशासन की स्थिति
भरूच की यह जामा मस्जिद वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में एक ‘राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक’ है. ऐतिहासिक दस्तावेजों और गजट (जैसे 26 मई 1909 के गजट नोटिफिकेशन) के अनुसार, इस स्थल को ब्रिटिश काल से ही जामा मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है.
जब हाल ही में इस स्थल को लेकर विवाद बढ़ा और तहखाने व मूर्तियों के वीडियो सामने आए, तो स्थानीय प्रशासन और ASI पूरी तरह सतर्क हो गए. कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए एहतियात के तौर पर परिसर के कुछ हिस्सों और मुख्य प्रवेश द्वारों पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. सुरक्षाबलों की तैनाती के साथ ही प्रशासनिक अधिकारी यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि किसी भी पक्ष द्वारा माहौल को खराब न किया जाए.
विवाद की मुख्य जड़ और पृष्ठभूमि
ऐतिहासिक रूप से, भारत के कई प्राचीन शहरों की तरह भरूच में भी अलग-अलग राजवंशों का शासन रहा है. सल्तनत काल और मध्यकालीन इतिहास के जानकारों के अनुसार, इस क्षेत्र में कई ऐसी इमारतें हैं जिनकी वास्तुकला में स्थानीय भारतीय शैलियों और इस्लामी वास्तुकला का मिश्रण देखने को मिलता है.
वर्तमान विवाद मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि मध्यकाल में शासकों के बदलाव के दौरान क्या मौजूदा धार्मिक स्थलों का रूप बदला गया था या नहीं. देश के अन्य ऐतिहासिक विवादों जैसे ज्ञानवापी या शाही ईदगाह मामलों की तर्ज पर अब भरूच की इस 700 साल पुरानी मस्जिद पर भी अदालतों में कानूनी लड़ाई शुरू हो चुकी है.
भरूच की जामा मस्जिद का यह मामला एक बार फिर इतिहास, पुरातत्व और धार्मिक आस्था के जटिल समीकरणों को सामने लाता है. एक तरफ जहां हिंदू और जैन पक्ष इसे अपने प्राचीन धार्मिक अवशेषों से जुड़ा स्थल बताकर कानूनी और वैज्ञानिक सर्वेक्षण की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष इसे सदियों पुरानी अपनी सांस्कृतिक व धार्मिक धरोहर मानकर इसकी यथास्थिति बनाए रखने पर अड़ा है. अब सभी की निगाहें अदालत की आगामी सुनवाइयों और एएसआई की रिपोर्ट पर टिकी हैं कि न्यायपालिका इस ऐतिहासिक और संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाती है.
