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क्या होता है ग्रेड-पे, इससे कैसे तय होती है सैलरी? जानें पूरा गणित


सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं या सरकारी कर्मचारियों के बीच अक्सर ग्रेड-पे शब्द सुनने को मिलता है. जब भी कोई नई सरकारी वैकेंसी निकलती है, तो नोटिफिकेशन में सैलरी के साथ ग्रेड-पे का जिक्र जरूर होता है. बहुत से लोग यह सोचते हैं कि जितना ग्रेड-पे लिखा है, कर्मचारी को हर महीने उतनी ही सैलरी मिलेगी, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है.

विश्वसनीय सरकारी नियमों और 7वें वेतन आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, ग्रेड-पे आपकी पूरी सैलरी तय करने का एक पैमाना या बेस होता है. यदि आप भी सरकारी कर्मचारी बनने का सपना देख रहे हैं, तो यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर ग्रेड-पे क्या होता है और इससे आपकी इन-हैंड सैलरी का गणित कैसे तय होता है.

क्या होता है ग्रेड-पे और इसका मूल मतलब?

सरल शब्दों में कहें तो ग्रेड-पे सरकारी कर्मचारियों के पद, जिम्मेदारी और उनके स्तर को तय करने वाली एक राशि होती है. यह कर्मचारी के रैंक के हिसाब से अलग-अलग होती है. उदाहरण के लिए, ग्रुप डी के कर्मचारियों का ग्रेड-पे कम होता है, जबकि IAS या क्लास-1 अफसरों का ग्रेड-पे बहुत ज्यादा होता है.

छठे वेतन आयोग तक सैलरी तय करने में सीधे तौर पर ग्रेड-पे का इस्तेमाल होता था. हालांकि, 7वें वेतन आयोग के लागू होने के बाद ग्रेड-पे को हटाकर पे-मैट्रिक्स लेवल में बदल दिया गया है, लेकिन आज भी पुरानी व्यवस्था को समझने और समझने के लिए ग्रेड-पे को ही आधार माना जाता है.

ग्रेड-पे से कैसे तय होती है बेसिक सैलरी?

ग्रेड-पे का सबसे पहला और मुख्य काम कर्मचारी की बेसिक सैलरी को तय करना होता है. किसी भी सरकारी पद के लिए एक निश्चित पे-बैंड और ग्रेड-पे तय होता है. इन दोनों को जोड़कर कर्मचारी की शुरुआती बेसिक सैलरी बनती है.

मान लीजिए किसी पद का शुरुआती पे-बैंड 9,300 रुपये है और उसका ग्रेड-पे 4,200 रुपये निर्धारित किया गया है, तो उस कर्मचारी की शुरुआती बेसिक सैलरी इन दोनों का जोड़ यानी 13,500 रुपये के आसपास तय होगी. 7वें वेतन आयोग के पे-मैट्रिक्स में इसी बेसिक सैलरी के आधार पर आगे का पूरा कैलकुलेशन किया जाता है.

सैलरी के गणित में भत्तों का खेल

बेसिक सैलरी तय होने के बाद कर्मचारी को मिलने वाले विभिन्न सरकारी भत्तों का हिसाब लगाया जाता है. यही भत्ते आपकी सैलरी को कई गुना बढ़ा देते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण होता है महंगाई भत्ता, जो बेसिक सैलरी के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में तय होता है.

इसके अलावा कर्मचारी को मकान किराया भत्ता मिलता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि कर्मचारी किस शहर में रह रहा है. इसके साथ ही ट्रैवल अलाउंस और मेडिकल अलाउंस जैसे अन्य लाभ भी बेसिक सैलरी के आधार पर ही कैलकुलेट करके जोड़े जाते हैं.

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इन-हैंड सैलरी निकालने का पूरा फॉर्मूला

किसी भी सरकारी कर्मचारी की कुल मासिक सैलरी निकालने का एक सीधा फॉर्मूला होता है. इसके तहत कर्मचारी की बेसिक सैलरी, महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता और यात्रा भत्ता को आपस में जोड़ दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी कर्मचारी की कुल बेसिक सैलरी 40,000 रुपये है और उस समय डीए 50% है, तो उसे 20,000 रुपये डीए मिलेगा.

इसके साथ एचआरए और टीए जोड़कर ग्रॉस सैलरी लगभग 70,000 रुपये से अधिक बन जाएगी. हालांकि, इस ग्रॉस सैलरी में से पीएफ और नेशनल पेंशन सिस्टम के पैसे कटने के बाद ही नेट इन-हैंड सैलरी बैंक खाते में आती है.

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