जम्मू-कश्मीर में 26 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विलय दिवस पर, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्य के ऐतिहासिक विलय के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करने के लिए महात्मा गांधी के ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ के दृष्टिकोण का जिक्र किया. साथ ही, उन्होंने कश्मीरियों के प्रति पैदा हुए अविश्वास के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को जिम्मेदार ठहराया.
महबूबा मुफ्ती ने कहा, ‘लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला द्वारा विलय की पुष्टि ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह भरोसा दिलाया कि भारत कोई ‘कब्जा करने वाली ताकत’ नहीं है. हालांकि, जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संस्कृति की रक्षा के लिए यह विलय कुछ शर्तों के साथ हुआ था, लेकिन इसका मकसद कभी भी भारत संघ के खिलाफ जाना नहीं था. इसे ही अनुच्छेद 370 और 35A के रूप में जाना गया, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर भारत के साथ जुड़ा और नेहरू जैसे नेताओं ने भी ऐसा ही वादा किया था.
‘आज कश्मीर सबसे ज्यादा सैन्यीकृत इलाका’
पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि 1953 तक शेख अब्दुल्ला इसके खिलाफ हो गए, और उन्हें टक्कर देने के लिए RSS ने ‘एक देश, एक संविधान’ का अभियान शुरू कर दिया.’ महबूबा मुफ्ती ने आगे कहा कि इस फैसले का खामियाजा कश्मीर आज भी भुगत रहा है. महबूबा ने कहा, ‘आज कश्मीर सबसे ज्यादा सैन्यीकृत (militarized) इलाका है. यह उस अविश्वास का नतीजा है जो शेख अब्दुल्ला द्वारा जनमत संग्रह (plebiscite) का अभियान शुरू करने के बाद पैदा हुआ था, और इसी वजह से कश्मीरी लोगों पर ‘आतंकवादी’ होने का ठप्पा लग गया.’
श्रीनगर में पत्रकारों और पार्टी सदस्यों से बात करते हुए, मुफ्ती ने 1947 के ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (विलय पत्र) के ऐतिहासिक संदर्भ का ज़िक्र किया. उन्होंने बताया कि 1947 के बंटवारे के समय, मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद, जम्मू-कश्मीर ने धार्मिक आधार पर बंटवारे को ठुकरा दिया था. उन्होंने महात्मा गांधी के धर्मनिरपेक्ष भारत का साथ चुना था. मुफ्ती ने भारत के लोगों को 1947 में किए गए उन वादों की याद दिलाई.
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जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारत की जनता पर पूरा भरोसा
महबूबा ने कहा, ‘आज हम उस दिन का जश्न मनाते हैं जब हम एक महान राष्ट्र का हिस्सा बने थे, लेकिन भारत के लोगों को भी अपना वादा निभाना चाहिए, क्योंकि आज हम भारी दबाव और हमलों का सामना कर रहे हैं.’ उन्होंने चेतावनी दी कि केवल ताकत के दम पर कश्मीर मुद्दे को हल नहीं किया जा सकता. महबूबा मुफ्ती ने अपना राजनीतिक रुख दोहराते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को हटाने का फैसला, असल में विलय के समय हुए उन मूल समझौतों को ‘रद्दी की टोकरी में डालने’ जैसा है, जो कुछ शर्तों के साथ किए गए थे.
‘अगर सरकार चाहती है कि कश्मीर का मुद्दा अगले 80 सालों तक ऐसे ही उलझा रहे, और यहां पहले से मौजूद 8 लाख सैनिकों की जगह 16 लाख सैनिक तैनात कर दिए जाएं, तो मैं भारत के लोगों को याद दिलाना चाहती हूं कि यह ‘विलय पत्र’ (Instrument of Accession) महज कागज का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर के लोगों से किए गए वादों का एक दस्तावेज है.’
अपने संवैधानिक तर्कों के साथ-साथ, महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर घाटी के युवाओं से पुरजोर अपील की कि वे बंदूक संस्कृति और हिंसा से दूर रहें. उन्होंने कहा कि भले ही सरकार और अदालतों ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को निराश किया है, लेकिन उन्हें भारत की आम जनता पर पूरा भरोसा है.
‘बीजेपी उस संविधान को कुचल रही है जिसने हमें…’
‘बीजेपी उस संविधान को कुचल रही है जिसने हमें अनुच्छेद 370 दिया था. मुझे अदालतों और सरकार पर तो भरोसा नहीं है, लेकिन भारत के लोगों पर पूरा भरोसा है. हमें सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं है, और बीजेपी इस ‘जबरन थोपी गई शांति’ को अपनी जीत के तौर पर पेश कर रही है.’
महबूबा ने कहा, ‘यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है. आज हम भारत के लोगों को उन वादों की याद दिलाना चाहते हैं जो जम्मू-कश्मीर के लोगों से किए गए थे.’ उन्होंने जोर देकर कहा कि इस क्षेत्र के विशेष दर्जे और पहचान को बहाल करने की लड़ाई पूरी तरह से लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों से लड़ी जानी चाहिए.
महबूबा ने कहा, ‘तुर्की और पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा उठाया है, और यूपी के आगामी चुनावों में भी कश्मीर सबसे बड़ा एजेंडा होगा. लेकिन खुद कश्मीर में इस मुद्दे को उठाने की इजाजत नहीं है और हमें बात करने की भी अनुमति नहीं है. कश्मीरी आज भी वहीं खड़े हैं, जहां वे 1947 में थे.’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि ताकत के जोर पर थोपी गई ‘जबरन शांति’ को असली शांति समझने की गलती नहीं करनी चाहिए.
