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Explained: इजराइल के चुनाव में भारत को क्यों इतनी दिलचस्पी, क्या नेतन्याहू की हार से फायदा होगा?


इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के बाद 28 अक्टूबर को भी तस्वीर साफ नहीं हुई है. करीब 76.8% वोटों की गिनती के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गुट 55 सीटों पर आगे है, जबकि पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट का विपक्षी गुट 49 सीटों पर है. सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सीटें चाहिए और किसी भी गुट के पास वह बहुमत नहीं दिख रहा. इजराइल एक ‘हंग नेसेट’ की ओर बढ़ रहा है, जहां या तो महीनों तक गठबंधन की खींचतान चलेगी या दोबारा चुनाव की नौबत आएगी.

भारत के लिए यह सस्पेंस इसलिए अहम है क्योंकि उसके तीन सबसे बड़े हित इजराइल से रक्षा तकनीक, खाड़ी में 178 अरब डॉलर का व्यापार और ईरान से जुड़ी कनेक्टिविटी ऐसे मोड़ पर हैं जहां इजराइल का अगला नेतृत्व तय करेगा कि ये रिश्ते किस रफ्तार से चलेंगे…

विदेश मामलों के जानकार और BHU के प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय से बातचीत के आधार पर…

नेतन्याहू आगे, लेकिन बहुमत से दूर

28 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे तक नेतन्याहू के गुट को 54 सीटें मिल रही हैं. 76.8% प्रतिशत वोट गिने जाने के बाद भी किसी भी गुट के पास बहुमत का रास्ता नहीं दिख रहा. फिलिस्तीनी दलों को 19 सीटें मिल रही हैं.

सबसे बड़ी बात यह है कि अरब दल ‘किंगमेकर’ बन गए हैं. अगर आइजनकोट को सरकार बनानी है, तो उन्हें अरब दलों से बात करनी पड़ सकती है, लेकिन उन्होंने पहले ही कह दिया है कि वे ऐसा नहीं करेंगे. नेतन्याहू ने भी कहा है कि अरब दलों के सहारे सरकार नहीं बननी चाहिए. इसका मतलब यह है कि सरकार बनने में हफ्ते या महीने लग सकते हैं. इस बीच नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं.

सार्वजनिक तौर पर शांत, निजी तौर पर नजर

भारत सरकार ने 28 अक्टूबर की स्थिति तक इजराइल के चुनाव नतीजों पर कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है. यह भारत की उस आम कूटनीतिक परंपरा के अनुरूप है जिसमें वह किसी भी देश के आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम पर सार्वजनिक टिप्पणी से बचता है.

चुनाव से पहले ही भारत में इजराइली दूतावास की प्रवक्ता मिशेल सिरोटा ने कहा था कि चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, भारत-इजराइल के द्विपक्षीय संबंधों में कोई बदलाव नहीं आएगा.

सिरोटा ने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते ‘किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं हैं’.

इजराइली राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड ने भी कहा, ‘चुनाव कौन जीते, इजराइल और भारत अच्छे दोस्त बने रहेंगे.’

भारत की रणनीति यह है कि वह किसी एक नेता पर दांव न लगाकर, संस्थागत रिश्ते को मजबूत रखे. साथ ही यह भी माने कि नए प्रधानमंत्री और मोदी के बीच ‘केमिस्ट्री’ का फैक्टर कम हो सकता है.

रक्षा: 8.6 अरब डॉलर का पैकेज पहले ही मंजूर

रक्षा भारत-इजराइल रिश्ते का सबसे ठोस हिस्सा है और यहां ज्यादा बदलाव की गुंजाइश नहीं दिखती. इजराइल अपने कुल हथियार निर्यात का करीब 34 प्रतिशत हिस्सा भारत को भेजता है. 2026 में दोनों देशों के बीच 8.6 अरब डॉलर का रक्षा पैकेज पहले ही तय हो चुका है.

इसमें SPICE-1000 प्रिसिजन गाइडेंस किट, रैम्पेज एयर-टू-सरफेस मिसाइल, Air LORA बैलिस्टिक मिसाइल और टेजस Mk-1A के लिए AESA रडार शामिल हैं. इसके अलावा, 10 अरब डॉलर तक के सौदे की बात चल रही है, जिसमें आयरन डोम और लेजर डिफेंस टेक्नोलॉजी का सह-उत्पादन शामिल हो सकता है.

हालांकि, जो पैकेज पहले ही मंजूर हो चुका है, वह तकनीकी और संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ता रहेगा. ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत भारत को इजराइली तकनीक के लिए नई सरकार की राजनीतिक मंजूरी की जरूरत होगी. अगर सरकार बनने में देरी होती है, तो इन सौदों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, भले ही उन्हें रद्द न किया जाए.

व्यापार: FTA की बातचीत रुकेगी या नहीं?

भारत और इजराइल के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत अभी शुरुआती दौर में है. फरवरी 2026 में PM मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रिश्ते को ‘शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया था. द्विपक्षीय व्यापार करीब 3.93 अरब डॉलर का है. दोनों देश AI, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर और कृषि जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं.

इसका असर यह है कि FTA की दिशा में बनी बुनियादी सहमति पर चुनाव का सीधा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व बदलने पर बातचीत की प्राथमिकता और रफ्तार बदल सकती है. अगर आइजनकोट या कोई अन्य नेता सत्ता में आते हैं, तो वे पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को ज्यादा तवज्जो दे सकते हैं. इससे भारत के साथ FTA की बातचीत कुछ महीनों के लिए पीछे जा सकती है, लेकिन रद्द होने की संभावना बहुत कम है.

ईरान: सबसे कमजोर कड़ी

इजराइल चुनाव का भारत के लिए सबसे नाजुक असर ईरान पर पड़ता है. यहां तस्वीर पहले से ही खराब है. अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते चाबहार बंदरगाह परियोजना पहले ही गंभीर रूप से अटकी हुई है. अप्रैल 2026 में भारत को मिली प्रतिबंधों से छूट खत्म हो गई थी. इसके बाद भारत ने परियोजना से पीछे हटने के संकेत दिए थे. भारत ने 2026-27 के बजट में चाबहार परियोजना के लिए कोई नया फंड आवंटित नहीं किया है.

इसका मतलब यह नहीं कि भारत ने ईरान को छोड़ दिया है. भारत की रणनीति ‘रणनीतिक धैर्य’ की है. वह प्रतिबंधों के बीच भी चाबहार को लंबे समय के विकल्प के रूप में बनाए रखना चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने की संभावना बहुत कम है.

28 अक्टूबर 2026 की स्थिति में इजराइल का अगला नेतृत्व ईरान के प्रति अपना रुख तय करेगा. अगर इजराइल ईरान के साथ और टकराव की राह चुनता है, तो अमेरिकी प्रतिबंध और सख्त हो सकते हैं. इससे चाबहार जैसी परियोजनाओं के लिए भारत की जगह और भी कम हो जाएगी.

आइजनकोट को ईरान के मामले में नेतन्याहू से ज्यादा सतर्क माना जा रहा है. इन्होंने चुनाव से पहले ही चेतावनी दी थी कि नेतन्याहू ‘इजराइल की सुरक्षा का इस्तेमाल राजनीतिक मकसद के लिए’ कर सकते हैं, जिसमें ईरान पर नया हमला भी शामिल हो सकता है.

खाड़ी: 178 अरब डॉलर का व्यापार और एक करोड़ भारतीय

भारत के लिए सबसे बड़ी ‘अनदेखी’ जरूरत खाड़ी है और यह इजराइल चुनाव के नतीजे से सीधे तौर पर नहीं बदलती, लेकिन इजराइल-ईरान तनाव के किसी भी बढ़ने का सीधा असर यहीं पड़ेगा. 2025-26 में भारत का खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के साथ व्यापार करीब 178.63 अरब डॉलर था. खाड़ी में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं.

अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने जैसा कोई कदम उठाता है या इजराइल-ईरान टकराव बढ़ता है, तो इसका असर शिपिंग लागत, व्यापार मार्गों और खाड़ी की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. इससे भारतीय कामगारों की नौकरियां और रेमिटेंस दोनों प्रभावित होंगी. यही वजह है कि भारत इजराइल के साथ रिश्ता गहरा करते हुए भी खाड़ी और ईरान के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह नहीं छोड़ सकता.

इजराइल में सरकार बनने में जितनी देर, भारत के लिए उतनी ही ‘अनिश्चितता’

28 अक्टूबर की सबसे बड़ी खबर यह नहीं है कि कौन आगे है, बल्कि यह है कि कोई भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. नेतन्याहू 55 पर अटके हैं, आइजनकोट 49 पर और अरब दलों के सहारे के बिना किसी का रास्ता नहीं बनता.

इस ‘हंग नेसेट’ का मतलब भारत के लिए यह है कि रक्षा और व्यापार के बड़े फैसले महीनों तक लटक सकते हैं, जबकि ईरान और खाड़ी से जुड़े मुद्दों पर कोई भी राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए जोखिम बढ़ाती है.

भारत की सबसे समझदारी भरी रणनीति यही होगी कि वह इजराइल में किसी भी नई सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार रहे, लेकिन खाड़ी और ईरान के साथ अपने रिश्तों को भी उसी संतुलन के साथ बनाए रखे. भारत की असली परीक्षा इजराइल के चुनाव में नहीं, बल्कि उसके बाद की ‘तीन-तरफा कूटनीति’ में है.



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