- जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा दिल्ली हाईकोर्ट की स्थायी जज हैं.
- उन्होंने 24 साल की उम्र में मजिस्ट्रेट का पद संभाला.
- वह दिल्ली शराब नीति मामले की सुनवाई कर रही हैं.
- केजरीवाल ने उन्हें इस मामले से हटाने की मांग की.
दिल्ली के सियासी और कानूनी माहौल में इन दिनों एक नाम बार-बार सुनाई दे रहा है जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा. राजधानी में चल रहे एक अहम मामले की सुनवाई उनके सामने है और इसी वजह से वे अचानक चर्चा के केंद्र में आ गई हैं. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद अदालत में उपस्थित हुए. हैरानी की बात यह रही कि वे उत्पाद शुल्क नीति मामले की दलील रखने नहीं, बल्कि उस जज को हटाने की मांग वाली याचिका पर अपना पक्ष रखने पहुंचे, जो इस मामले की सुनवाई कर रही हैं. आइए जानते हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बारे में…
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई भी दिल्ली में ही हुई. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर दौलत राम कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में बी.ए. ऑनर्स किया. कॉलेज के दिनों में वह इतनी होनहार थीं कि उन्हें साल की “सर्वश्रेष्ठ ऑल-राउंडर छात्रा” का खिताब मिला. साहित्य से लगाव था, लेकिन दिल में कानून की समझ भी उतनी ही गहरी थी.
साल 1991 में उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा और साल 2004 में एलएलएम की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के प्रति उनका जुनून यहीं नहीं रुका. लंबे शोध के बाद उन्हें साल 2025 में पीएचडी की उपाधि मिली. उनकी शोध का विषय था न्यायिक शिक्षा, जिसमें उन्होंने यूके, अमेरिका, सिंगापुर और कनाडा जैसे देशों की न्याय व्यवस्था का अध्ययन किया. इतना ही नहीं, उनके पास मार्केटिंग मैनेजमेंट और एडवरटाइजिंग में भी डिप्लोमा है.
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24 साल की उम्र में बनीं मजिस्ट्रेट
जस्टिस शर्मा के करियर की सबसे खास बात यह है कि उन्हें कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं. वह सिर्फ 24 साल की उम्र में मजिस्ट्रेट बन गई थीं. यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. उनकी कार्यशैली और फैसलों की गंभीरता को देखते हुए जब वह 35 साल की हुईं, उसी समय उन्हें सत्र न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत कर दिया गया.
कई बड़े मामलों में सुनवाई
तीन दशकों से अधिक के अपने करियर में उन्होंने दिल्ली की कई अहम अदालतों में काम किया. उन्होंने सीबीआई की स्पेशल जज के रूप में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की सुनवाई की. फैमिली कोर्ट की प्रिंसिपल जज रहते हुए पारिवारिक विवादों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई. महिला अदालत और POCSO कोर्ट में रहते हुए उन्होंने महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों पर सख्त रुख अपनाया. मार्च 2022 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट की स्थायी जज के रूप में नियुक्त किया गया. इससे पहले वह राउज एवेन्यू कोर्ट में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के पद पर कार्यरत थीं.
कितनी मिलती है सैलरी?
दिल्ली हाई कोर्ट की जज के रूप में उनका वेतन करीब 2.25 लाख प्रति माह माना जाता है. इसके अलावा उन्हें अन्य भत्ते और सरकारी आवास भी मिलता है. लेकिन उनकी पहचान सिर्फ वेतन या पद से नहीं है, बल्कि उनके अनुभव और काम से है. हाल के वर्षों में वह दिल्ली शराब नीति मामले से जुड़ी कार्यवाही में अपनी भूमिका के कारण भी चर्चा में रही हैं.
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