भारत में हर आम नागरिक की रसोई का बजट बिगड़ा हुआ है. रोजमर्रा की जिंदगी के सबसे बुनियादी खाद्य पदार्थ आटा, दाल, दूध और चिकन लगातार महंगे हो रहे हैं. भारत में खाद्य महंगाई आम आदमी की जेब पर सीधा असर डाल रही है. इन खाद्य वस्तुओं के महंगे होने के पीछे की मुख्य वजहें, सप्लाई चेन की चुनौतियां और आने वाले समय में इनकी कीमतें कब तक कम हो सकती हैं, इसका विश्लेषण यहां प्रस्तुत है.
खाद्य पदार्थ क्यों महंगे हो रहे हैं?
खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने के पीछे कोई एक अकेली वजह नहीं है, बल्कि मौसम का उतार-चढ़ाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार के हालात, ईंधन/चारे की लागत और सरकारी नीतियां मिलकर इस तेजी को बढ़ावा दे रही हैं.
आटा क्यों महंगा हो रहा है?
हाल के वर्षों में अनिश्चित मानसून और बुवाई के मौसम में पड़ी अत्यधिक गर्मी के कारण गेहूं की फसल की पैदावार प्रभावित हुई है. जब सरकार को ओपन मार्केट सेल्स स्कीम के तहत गेहूं का पर्याप्त स्टॉक जारी करने में संतुलन बनाना पड़ता है, तो खुले बाजार में थोक कीमतें बढ़ जाती हैं.
डीजल और बिजली की बढ़ती दरों के कारण गेहूं की पेराई (मिलिंग) और ट्रांसपोर्टेशन महंगा हुआ है, जिसका सीधा असर आटे के खुदरा रेट पर पड़ता है.
दालों की कीमतों में उछाल क्यों?
तुअर (अरहर), उड़द और चने की दालों के मुख्य उत्पादक राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक) में कभी सूखा तो कभी बेमौसम बारिश से बुवाई और फसल को भारी नुकसान पहुंचा है.
भारत दालों के घरेलू उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है. मोज़ाम्बिक, म्यांमार और तंजानिया जैसे देशों से आयात होने वाली दालों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें और शिपिंग (लॉजिस्टिक्स) लागत बढ़ने से घरेलू बाजार में भी दालें महंगी हो गई हैं.
दूध की दरों में बढ़ोतरी की वजह
दूध महंगा होने का सबसे बड़ा कारण हरा चारा और खली (सरसों खली, बिनौला, चावल की भूसी) का महंगा होना है. चारे की कीमतों में 50% से 70% तक की भारी वृद्धि देखी गई है. डेयरी किसानों के लिए पशुओं के रख-रखाव, दवाओं और चारा खरीदने की लागत काफी बढ़ गई है. जब किसानों की लागत बढ़ती है, तो अमूल और मदर डेयरी जैसी प्रमुख कंपनियों को दूध के खरीद दाम बढ़ाने पड़ते हैं.
चिकन क्यों हुआ महंगा?
चिकन और अंडे के महंगा होने की 80% वजह पोल्ट्री फीड का महंगा होना है. मुर्गियों के दाने में मक्का और सोयाबीन मील का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है.
सरकार की पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के कारण एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों द्वारा मक्के की भारी खरीद की जा रही है. इससे पोल्ट्री फार्मर्स के लिए मक्के की उपलब्धता कम हुई है और मक्के की कीमतें ऐतिहासिक स्तर पर पहुxच गई हैं.
कीमतें कब और कैसे कम होंगी?
आने वाले महीनों में इन वस्तुओं की कीमतों में राहत की उम्मीद अलग-अलग कारकों पर निर्भर करती है.
आटा और दाल
रबी सीजन (गेहूं और चने की नई फसल) की कटाई और मंडियों में आवक शुरू होने के बाद आटा और दालों की कीमतों में गिरावट या स्थिरता देखने को मिल सकती है. यदि सरकार दालों का आयात शुल्क कम करती है और बफर स्टॉक से खुले बाजार में गेहूं जारी करती है, तो कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं.
दूध और चिकन
सर्दियों के मौसम (नवंबर से फरवरी) को डेयरी क्षेत्र में ‘फ्लश सीजन’ माना जाता है, जब गाय-भैंसों का दूध उत्पादन प्राकृतिक रूप से बढ़ता है. सर्दियों में दूध की सप्लाई सुधरने से आगे दरों में और बढ़ोतरी रुक सकती है, हालांकि चारे के दाम कम हुए बिना दूध के दाम में बड़ी कटौती की संभावना कम है.
चिकन: नई मक्का और सोयाबीन की फसल बाजार में आने पर पोल्ट्री फीड की दरें संतुलित होंगी. इसके बाद ही ब्रॉयलर चिकन के दामों में उपभोक्ताओं को राहत मिल सकेगी.
खाद्य पदार्थों की मौजूदा महंगाई मुख्य रूप से कृषीय लागतों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और पशु आहार की कमी से जुड़ी हुई है. जब तक नई रबी फसलों का आगमन बाजार में नहीं होता और पोल्ट्री फीड/चारे की सप्लाई सामान्य नहीं हो जाती, तब तक खाद्य महंगाई से तुरंत पूर्ण राहत मिलना कठिन है. सरकार द्वारा आयात नीतियों में ढील देने और राशन नेटवर्क के जरिए आपूर्ति बढ़ाने से ही आम उपभोक्ताओं को तात्कालिक राहत मिल सकती है.
