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‘…तो आत्महत्या कर लेना ही बेहतर है’, उद्धव ठाकरे ने क्यों कही ये बात?


शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पत्रकारिता, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौजूदा राजनीतिक हालात पर अपनी बात रखते हुए सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि अगर राजा गलती करता है, तो उसे गलत कहना ही चाहिए. हम 2019 तक बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राजा की हर बात सही मान ली जाए.

उन्होंने कहा कि अगर देश की स्थिति सबके सामने बिगड़ रही हो और लोग आवाज नहीं उठाएं, तो ऐसी स्थिति में चुप रहने का कोई मतलब नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर हम सबके सामने देश की बर्बादी होते हुए देखें और आवाज नहीं उठाएं, तो आत्महत्या कर लेना बेहतर है.

उद्धव ठाकरे ने कहा कि अगर सरकार लोगों के अधिकार छीनने की कोशिश करेगी, तो हम सत्ता बदलने के लिए ही आए हैं. उन्होंने पत्रकारिता की परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि पत्रकारों का काम केवल खबरें देना नहीं, बल्कि गलतियों पर सवाल उठाना और सत्ता को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराना भी है.

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पत्रकारिता की परंपरा और निष्पक्षता पर बोले उद्धव ठाकरे

उद्धव ठाकरे ने कहा कि पत्रकारिता की अपनी एक परंपरा और इतिहास रहा है. बालशास्त्री जांभेकर को महाराष्ट्र की पत्रकारिता की गंगोत्री बताते हुए उन्होंने उनके अखबार ‘दर्पण’ का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि भाऊ महाजन ने ‘प्रभाकर’ की शुरुआत की थी, जिसमें प्रकाशित ‘शतपत्र’ के जरिए गलत काम करने वालों पर प्रहार किया जाता था.

उन्होंने लोकमान्य तिलक, गोपाल गणेश आगरकर और आचार्य अत्रे जैसे दिग्गजों का उल्लेख करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में पत्रकारिता की एक मजबूत परंपरा रही है, जिसमें सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछे जाते थे.

उद्धव ठाकरे ने निष्पक्षता का अर्थ समझाते हुए फुटबॉल का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि अगर खेल के दौरान कोई गलती करता है, तो उसे रेड कार्ड दिया जाता है. खिलाड़ी मेसी भी गलती करे, तो उसे कार्ड दिया जाता है. इसलिए निष्पक्षता का मतलब यह नहीं कि किसी के प्रभाव में आकर उसकी गलती को नजरअंदाज कर दिया जाए.

उद्धव ठाकरे ने एक व्यंग्यचित्र का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने दिल्ली में 30 फुट के कॉकरोच को जलाए जाने से जुड़ा एक कार्टून देखा. इसी संदर्भ में उन्होंने तंज कसते हुए कहा, ‘राम को लाने वाला झुर्रल से डर रहा है.’ उन्होंने कहा कि व्यंग्यचित्रकार भी पत्रकारिता का हिस्सा हैं. पत्रकारों और व्यंग्यचित्रकारों का काम समाज और सत्ता के सामने वास्तविक स्थिति रखना है.

‘मतभेद का मतलब दुश्मनी नहीं’

उद्धव ठाकरे ने अपने परिवार और आचार्य अत्रे के बीच पुराने मतभेदों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके दादा और आचार्य अत्रे के बीच विवाद हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उनके घर में कभी अत्रे के बारे में बुरा नहीं बोला गया. उन्होंने कहा कि मतभिन्नता और मतभेद के बीच फर्क होता है. राजनीतिक या वैचारिक मतभेद होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति को दुश्मन मान लिया जाए.

उन्होंने शरद पवार के मुख्यमंत्री बनने के समय का एक किस्सा भी सुनाया. उद्धव के मुताबिक, जब शरद पवार मुख्यमंत्री बने, तब बालासाहेब ठाकरे उन्हें बधाई देने वर्षा बंगले पर गए थे. पवार वहां मौजूद नहीं थे, इसलिए बालासाहेब ने उनकी पत्नी से कहा था कि उनके मित्र के मुख्यमंत्री बनने की खुशी है, लेकिन वह किस तरह मुख्यमंत्री बने, यह उन्हें पसंद नहीं आया.

समाज सुधार के लिए विरोध झेलने का किया जिक्र

उद्धव ठाकरे ने अपने दादा के सामाजिक सुधारों से जुड़े संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी भारी विरोध का सामना करना पड़ता था.

उन्होंने एक घटना का उल्लेख किया, जिसमें कम उम्र की लड़की की शादी एक उम्रदराज व्यक्ति से कराई जा रही थी. उनके मुताबिक, उनके दादा ने इस शादी का विरोध करते हुए मंडप जला दिया था. बाद में लड़की कुछ ही महीनों में विधवा हो गई. इसके बाद उन्होंने लड़की का दोबारा विवाह कराने की बात कही, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आखिरकार लड़की घर से भाग गई.

उद्धव ठाकरे ने कहा कि समाज में बदलाव लाने के लिए कई बार कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है. उन्होंने अपने परिवार पर हुए हमलों का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, उनके घर पर मरे हुए कुत्ते, गधे और कचरा फेंका गया, यहां तक कि जलते हुए गोले भी फेंके गए और जानलेवा हमला भी हुआ.

‘कुछ बोलते ही देशद्रोही कह दिया जाता है’

उद्धव ठाकरे ने कहा कि आज अगर कोई सरकार के खिलाफ कुछ बोलता है, तो उसे देशद्रोही कह दिया जाता है. दिल्ली में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने तंज कसा कि वहां पुलिस क्या डांडिया खेलने के लिए है?

‘2019 तक बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर थे’

बीजेपी के साथ अपने पुराने राजनीतिक संबंधों का जिक्र करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि 2019 तक उनके और बीजेपी के बीच वैमनस्य नहीं था. दोनों पार्टियां कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही थीं. हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर राजा गलती करता है, तो उसे गलती कहने का साहस होना चाहिए. उन्होंने कहा कि राजनीति में आज अभिनय ज्यादा हो गया है. राजनीति में वास्तविकता और दिखावे के बीच अंतर करना जरूरी है.

अंत में उद्धव ठाकरे ने कहा कि संभव है कि उनके हिस्से में पत्थर आएं, लेकिन उन्हीं पत्थरों से एक मजबूत इमारत खड़ी होगी. उनका यह बयान राजनीतिक संघर्ष के बीच अपने विचारों और संघर्ष को जारी रखने के संकल्प के रूप में देखा जा रहा है.

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