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नवरात्रि 11 अक्टूबर से, फिर बंगाल में दुर्गा पूजा 16 से क्यों शुरू? समझें तारीखों का पूरा खेल


Navratri Durga Puja 2026: नवरात्रि का पर्व आने वाला है. अगर आप घर में कलश स्थापना की तैयारी कर रहे हैं, तो कैलेंडर में 11 अक्टूबर की तारीख दिखती है. वहीं जब आप पश्चिम बंगाल सरकार की आधिकारिक छुट्टी सूची या कोलकाता टूर पैकेज देखते हैं, तो वहां 16 अक्टूबर का जिक्र मिलता है.

अब ऐसे में उलझन होना स्वाभाविक है. जब देवी एक ही हैं और महीना भी आश्विन ही है, तो फिर पूजा शुरू होने में 5 दिन का यह अंतर क्यों आता है? इसका सीधा संबंध हमारी सदियों पुरानी पूजा परंपराओं से है. इसे समझकर आप अपने सारे प्लान आसानी से बना सकते हैं.

11 अक्टूबर से क्या बदलेगा और घरों में क्या शुरू होगा?

11 अक्टूबर 2026 से आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के साथ शारदीय नवरात्रि शुरू हो रही है. देश के ज्यादातर हिस्सों में इसी दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है. घरों में कलश रखकर अखंड ज्योति जलाई जाती है.

भक्त नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हैं और मां शैलपुत्री की पूजा होती है. छत्तीसगढ़ के मां दंतेश्वरी मंदिर समेत कई शक्तिपीठों में 11 अक्टूबर से ही प्रतिपदा पूजा का विधान है.

अगर आप घर में व्रत और दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं, तो आपकी पूजा 11 तारीख से ही शुरू हो जाएगी. इसके लिए षष्ठी तिथि का इंतजार करने की जरूरत नहीं है.

बंगाल में 16 अक्टूबर की तारीख इतनी खास क्यों है?

बंगाल की प्रसिद्ध दुर्गा पूजा में षष्ठी तिथि का सबसे अधिक महत्व है. इस दिन से बड़े अनुष्ठान शुरू होते हैं. इनमें कल्पारंभ, अकाल बोधन, आमंत्रण और अधिवास शामिल हैं. कल्पारंभ का मतलब पूजा का विधिवत संकल्प लेना है. बोधन का अर्थ देवी को जगाना होता है.

इसके बाद मां से पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना की जाती है. पश्चिम बंगाल के जयरामबाटी स्थित मातृ मंदिर के अनुसार 16 अक्टूबर को षष्ठी, कल्पारंभ और बोधन है. इसलिए ट्रैवल एजेंसियां और सरकारी कैलेंडर 16 अक्टूबर से सक्रिय दिखते हैं.

हालांकि कोलकाता के पंचांग में 16 को बिल्व निमंत्रण और 17 अक्टूबर को बोधन दर्ज है. इसलिए किसी भी पंडाल में जाने से पहले वहां का शेड्यूल जरूर देख लें.

क्या बंगाल में पहले पांच दिन पूजा नहीं होती?

यह सोचना बिल्कुल गलत है कि बंगाल में मां दुर्गा पांच दिन बाद आती हैं. भले ही पंडालों के पट षष्ठी से खुलते हों, लेकिन पूजा पहले दिन से ही शुरू हो जाती है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण बेलूर मठ है. वहां प्रतिपदा से षष्ठी तक रोज पारंपरिक आगमनी गीत गाए जाते हैं.

पूरे नवरात्रि के दौरान चंडी पाठ भी चलता है. यानी भक्ति का माहौल 11 तारीख से ही बन जाता है. बस, सार्वजनिक मेला, ढाक की धुन और उत्सव षष्ठी से रफ्तार पकड़ता है.

अकाल बोधन की कहानी और घर वापसी का भाव

शरद ऋतु की इस पूजा को अकाल बोधन कहा जाता है. मान्यताओं के अनुसार, शरद काल देवताओं की निद्रा का समय होता है. लंका में रावण पर विजय पाने के लिए भगवान राम ने असमय ही मां दुर्गा को जगाया था. इसे ही अकाल बोधन कहा गया.

बंगाल में इस त्योहार का संबंध बेटी के मायके आने से भी है. ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ मायके आती हैं. यूनेस्को ने भी इस अपनेपन और सामाजिक जुड़ाव की वजह से इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है.

यह अंतर दो अलग त्योहारों का नहीं है. यह सिर्फ पूजा के दो अलग-अलग चरणों का फर्क है. 11 अक्टूबर से घर-घर में घटस्थापना और उपवास शुरू होंगे. वहीं, 16-17 अक्टूबर से पंडालों में धुनुची नाच, ढाक की थाप और सिंदूर खेला की रौनक देखने को मिलेगी.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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