Headlines

देश का पहला IIT कौन सा था? जेल से शुरू हुई थी पढ़ाई; जानें खास बातें


Show Quick Read

Key points generated by AI, verified by newsroom

  • इस संस्थान को 1956 में राष्ट्रीय महत्व का दर्जा मिला.

IIT का नाम सुनते ही आपके दिमाग में बेहतरीन पढ़ाई, बड़ी लैब, शानदार कैंपस और देश-दुनिया में पहचान की तस्वीर आने लगती है. मगर क्या आप जानते हैं कि देश का पहला IIT किसी महल या नई इमारत में नहीं, बल्कि एक पुराने जेल कैंप से शुरू हुआ था. यह कहानी है IIT खड़गपुर की जहां कभी आजादी के दीवानों को बंद रखा गया, वहीं बाद में इंजीनियरिंग की नई रोशनी जली.

आजादी से पहले, साल 1946 में यह समझ आ गया था कि देश को आगे बढ़ाने के लिए बड़े स्तर के तकनीकी संस्थान चाहिए. उसी समय एक समिति बनी, जिसकी अगुवाई एन.आर. सरकार ने की. इस समिति ने सुझाव दिया कि देश के चार हिस्सों पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में बड़े तकनीकी संस्थान खोले जाएं. इनकी पढ़ाई का स्तर दुनिया के बेहतरीन संस्थानों जैसा हो. यहां सिर्फ डिग्री ही नहीं, शोध और अच्छे शिक्षक भी तैयार हों. समिति ने कहा कि सबसे पहले पूर्व और पश्चिम में संस्थान शुरू किए जाएं. इसी सोच से पहला IIT जन्म लेने वाला था.

कोलकाता से हिजली तक का सफर

मई 1950 में पहला IIT शुरू हुआ. शुरुआत में इसकी कक्षाएं कोलकाता के एस्प्लानेड ईस्ट की एक इमारत से चलीं. लेकिन कुछ ही महीनों में इसे खड़गपुर के हिजली इलाके में शिफ्ट कर दिया गया. यही जगह आगे चलकर IIT खड़गपुर के नाम से जानी गई. 18 अगस्त 1951 को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया. उससे पहले ही इसका नाम इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी रख दिया गया था.

जहां कभी आजादी के सिपाही कैद थे

हिजली की इमारत पहले हिजली डिटेंशन कैंप थी. अंग्रेजों के समय यहां आजादी की लड़ाई में शामिल युवाओं को बिना मुकदमे के रखा जाता था. 16 सितंबर 1931 को यहां दो निहत्थे कैदियों संतोष कुमार मित्रा और तारकेश्वर सेनगुप्ता को गोली मार दी गई थी. इस घटना से पूरे देश में गुस्सा फैल गया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस यहां उनके शव लेने आए थे. रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई नेताओं ने इसका विरोध किया. यही इमारत बाद में पढ़ाई का केंद्र बनी. दुनिया में ऐसे बहुत कम संस्थान होंगे, जिनकी शुरुआत एक जेल से हुई हो.

ये भी पढ़ें: आईआईटी और एनआईटी की फीस में कितना होता है अंतर, जानिए किसमें मिलेगा अच्छा प्लेसमेंट?

कितने छात्रों से शुरू हुआ सफर?

अगस्त 1951 में जब पहला सत्र शुरू हुआ, तब यहां 224 छात्र और 42 शिक्षक थे. कक्षाएं, लैब और दफ्तर उसी ऐतिहासिक इमारत में चलते थे. उस समय केवल 10 विभागों से पढ़ाई शुरू हुई.मार्च 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नई इमारत की नींव रखी. धीरे-धीरे कैंपस का आकार बढ़ने लगा.

कैंपस की रूपरेखा एक प्रसिद्ध स्विस वास्तुकार डॉ. वर्नर मोसर के मार्गदर्शन में तैयार हुई. उद्योग मंत्रालय की मदद से कई आधुनिक मशीनें मंगाई गईं. उस समय की वर्कशॉप देश की बेहतरीन वर्कशॉप मानी जाती थी. IIT खड़गपुर को पहले निदेशक के रूप में महान वैज्ञानिक सर जे.सी. घोष मिले. उनके नेतृत्व में संस्थान ने मजबूत नींव पकड़ी. कई विदेशी प्रोफेसर भी शुरुआती दौर में यहां पढ़ाने आए. इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के पहले प्रमुख भी विदेश से आए थे.

राष्ट्रीय महत्व का संस्थान

15 सितंबर 1956 को संसद ने एक कानून पास किया, जिसके तहत IIT खड़गपुर को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया. इसे एक स्वायत्त विश्वविद्यालय का दर्जा भी मिला.

यह भी पढ़ें – फेल छात्रों को मिलेगा दूसरा मौका, NIOS के जरिए दोबारा दाखिले की प्रक्रिया शुरू

Education Loan Information:
Calculate Education Loan EMI



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *