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यूपी में पंचायत चुनाव पर इस फैसले से फेल हो गई विपक्ष की रणनीति! BJP के अपनों को भी लगा झटका?


उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है, जिसमें 58 हजार से अधिक निवर्तमान ग्राम प्रधानों को उनके कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी ‘प्रशासक’ के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी गई है. इस कदम के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि पंचायत चुनाव अब 2027 के विधानसभा चुनावों के बेहद करीब या उसके बाद कराए जा सकते हैं.

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पंचायती राज विभाग के आदेश के अनुसार, 2021 में चुनी गई ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया. नई पंचायतों के गठन तक मौजूदा ग्राम प्रधान अधिकतम छह महीने तक प्रशासक के तौर पर काम करेंगे. सरकार ने इसके लिए उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-A) का हवाला दिया है, जिसके तहत ‘अपरिहार्य परिस्थितियों’ या ‘जनहित’ में चुनाव टाले जा सकते हैं.

बड़ा नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे प्रशासक

सरकार के मुताबिक, प्रशासक(प्रधान) केवल रोजमर्रा के कामकाज संभालेंगे और कोई बड़ा नीतिगत फैसला जिला प्रशासन की मंजूरी के बिना नहीं ले सकेंगे. माना जा रहा है कि पंचायत चुनावों में आरक्षण व्यवस्था तय करने के लिए गठित OBC आयोग की रिपोर्ट आने में समय लग सकता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया आगे खिसक सकती है.

बीजेपी के सहयोगियों व विपक्ष की रणनीति फेल!

राजनीतिक जानकारों के अनुसार पंचायत चुनाव उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ी जमीनी राजनीतिक परीक्षा माने जाते हैं. इन चुनावों के जरिए दल स्थानीय नेताओं की पहचान, जातीय समीकरणों का आकलन और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करते हैं. विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि पंचायत चुनावों के जरिए वे ग्रामीण असंतोष और सत्ता विरोधी माहौल को भांपेंगे और खुद को मजबूत कर पाएंगे.

वहीं NDA के सहयोगी दल, जैसे अपना दल (S), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी भी इन चुनावों के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी में थे. अब चुनावों में संभावित देरी से सभी दलों की रणनीति प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है.

अब यह देखना होगा कि पंचायत चुनाव में देरी का असर, विधानसभा में राजनीतिक दलों की रणनीति पर क्या और कैसे पड़ता है?

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