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कैफ ने याद किया नेटवेस्ट फाइनल, 24 साल पहले रचा था इतिहास; लॉर्ड्स में दादा ने उतारी थी जर्सी


टीम इंडिया इन दिनों इंग्लैंड दौरे पर खेली गई 5 मैचों की टी20 सीरीज गंवा चुकी है. अब मेन इन ब्लू की नजर वनडे सीरीज पर है, जिसकी शुरुआत 14 जुलाई (मंगलवार) से होगी. वहीं 24 साल पहले आज ही के दिन यानी 13 जुलाई 2002 को इंग्लैंड के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर एक ऐसी जीत हुई थी जिसने इतिहास रच दिया था. उस जीत के हीरो मोहम्मद कैफ थे, जिसके बाद सौरव गांगुली ने लॉर्ड्स की बालकनी में जर्सी उतार दी थी. कैफ ने नेटवेस्ट ट्रॉफी की जीत को लेकर रवीश बिष्ट से खास बातचीत की.

सवाल- कैफ भाई 24 साल पूरे हो गए कैसे जिताया था आपने नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल?

जवाब- उस टाइम का माहौल अच्छा था. सौरव गांगुली ने बतौर कप्तान बहुत अच्छा काम किया था. जब आपके साथ कप्तान खड़ा हो सीनियर प्लेयर खड़े हो, जॉन राइट जैसा कोच हो तो आप 325 भी चेस कर दोगे क्योंकि आपको अपने खेल पर बिलीव बना रहता है, कहीं भी एक पॉइंट पर भी मुझे उस समय पर ऐसा नहीं लगा कि मैं इस टीम में वेलकम नहीं हूं या इस टीम में मेरी जगह नहीं बनती. कभी भी नहीं लगा मुझे मेरा नंबर 7 मिला था, नंबर 7 पर मेरा रोल डिफाइन था कि आपका ये काम है. आप रन बॉल नहीं बनाओगे तो भी आप अपना काम इंडियन टीम के लिए कर रहे हो. उस टीम में युवाओं का एक जलवा था. सीनियर प्लेयर्स का एक्सपीरियंस था. इस कॉम्बिनेशन में आप 325 भी चेस करते हो. 

सवाल- जब आप बैटिंग करने आए तो आपको क्या इंस्ट्रक्शन थे? कप्तान और कोच ने क्या कहा?

जवाब- नहीं यार उस टाइम पर ना थोड़ा सा तो हार मान ली थी. सचिन के आउट होने के बाद मतलब मोरल तो बहुत डाउन था. उस मैच में किसी ने कुछ नहीं बोला था क्योंकि जब सचिन आउट हुए तो सबको लगा ये मैच इंडियन टीम नहीं जीत पाएगी क्योंकि मैं उससे पहले भी खेला था तो मुझे कई बार 250-60 के चेस में यही बोला जाता था कि हां भाई लास्ट के 40 रन बचे हैं 50 बचे है कैफ खेलना लास्ट तक, खड़े रहना. बहुत बार जॉन राइट बोले, बहुत बार गांगुली बोले, जाते वक्त जब भी हम जा रहे हैं शाबाश लड़कों जीतना है.

इस मैच में किसी ने कुछ नहीं बोला था मुझे, क्योंकि इस मैच में जब सचिन पाजी आउट हुए तो सबको लगा कि अब नहीं हो पाएगा. वहां पर किसी ने मुझे कोई भी सजेशन या कोई एक वन लाइनर भी नहीं दिया. सबने चुप्पी चुप्पी साद ली थी बिल्कुल शांत पिन ड्रॉप साइलेंस.

तो मैं शांतिपूर्वक नीचे गया. उतरा कोई मेरा कोई वेलकम नहीं हुआ, किसी ने कोई ताली नहीं बजाई थी. मैं चुपचाप मानो यार यूं खजाना लूट चुका हो, कोई बातचीत नहीं. सब शांत थे. मैं अंदर गया ना कोई ताली मार रहा है, ना कोई वेलकम हो रहा है. सचिन पाजी आउट होकर जा रहे हैं. मैं अंदर उनको क्रॉस कर रहा हूं. 

सचिन पाजी ने भी कुछ नहीं कहा. वो अपने से परेशान थे. खुद से वो बड़े दुखी थे कि यार मैं आउट हो गया. क्राउड जाने लगा तो जब तक मैंने बैटिंग स्टार्ट नहीं करी. मुझे कोई ऐसा कोई सपोर्ट नहीं मिला जहां मुझे लगा हो कि यार अभी भी ये मैच जीत सकते हैं. 

सवाल- युवराज के साथ क्या बात हुई?

जवाब- युवराज सिंह सामने थे. मैं उनके साथ पहले भी खेला था और घूम फिर के यार आपकी ना जो तपस्या है हार्ड वर्क है वो मानसिक तौर पर मजबूती देती है. बिलीफ है कि भाई जब तक मैं खड़ा हूं ठीक है लोगों ने हार मान ली है, सबने हार मान ली है पर जब तक मैं खड़ा हूं अभी तब तक इंडियन टीम मैच नहीं हार रही है ये अपने आप को बार-बार याद दिलाना होता है.

सवाल- माहौल कैसा था?

जवाब- डेड माहौल था बिल्कुल. सब लोग हार मान चुके थे. आपकी लड़ाई जो जंग है ना वो खुद से है आप अकेले रहोगे जंग में अकेले हो ठीक है दुनिया के खिलाफ हो पर वहां आपको अपने आप से बार-बार बोलना पड़ता है. अभी जब तक तुम हो मैच खेलो, पार्टनरशिप बिल्ड करो, बॉल पे फोकस करो. हमने छोटे छोटे गोल पे फोकस किया था. आंख में आंख मिलाई भाग गए, हम लोग इतने तेज तर्रार थे भागने में फिटनेस बड़ा काम आई . प्रेशर में ना जब कई चीज आपके माइंड में चल रही होती है तो आप गेम देखना भूल जाते हो. क्या रिवर्सिंग हो रही है? नहीं हो रही. गेंदबाज क्या करना चाह रहा है? फील्ड क्या ली है? बहुत ही बारीकियों में अगर आप घुसे रहोगे ना तो फिर आप कोई भी मुश्किल काम अचीव कर सकते हो लाइफ में. ये उस मैच से मैंने सीखा. 

सवाल- और जब युवराज आउट हुए?

जवाब- युवराज सिंह जब आउट हो गए तो लास्ट तक मैच फसा हुआ था, युवराज से जब पार्टनरशिप हुई तो उम्मीद बढ़ गई थी. युवराज सिंह और मैं जब खेलने लगे पार्टनरशिप से उम्मीद जग गई पर कभी भी ये नहीं लगा कि यार अब तो निकाल लिया. वो बस आपको लास्ट तक मेहनत करनी थी, वो बहुत बड़ा था स्कोर 325 बहुत रन थे. ना हमको यार उस टाइम पर किस बेस पे खेलना है, आदत नहीं थी. ना टी20 का दौर किया था, ना आईपीएल आया था और ना हमने टी20 वर्ल्ड कप कभी जीता हुआ था. हमने कभी इतना बड़ा टारगेट चेस ही नहीं किया था.

युवराज सिंह से पार्टनरशिप बनी वो आउट हो गए फिर हरभजन से पार्टनरशिप लगी 40 के आसपास वो आउट हो गए. कुंबले आते आउट हो गए. अब दो विकेट बचे हैं. ना जहीर खान बैटिंग करते हैं और नेहरा साहब पैड करके बैठे हैं बैटिंग के लिए, वो जाना नहीं चाहते. ना वो तो उनके साथ मुझे काम करना था, तो मेरे साथ मेरा रोल ऐसा था कि मुझे गेंदबाजों के साथ वो मैच जितना था. आजकल का दौर नहीं कि नौ तक बैटिंग है. उस टाइम नंबर सात तक बैटिंग थी भाई. मुझे भी नहीं मालूम था की यार हरभजन को मैं क्या बोलू की सिंगल लेके दे या मार दे क्योंकि मैंने कभी गेंदबाजों के साथ बैटिंग नहीं की थी.

इस लिहाज से लोग इसीलिए इसको यादगार मैच मानते क्योंकि बहुत सी ऐसी चीजें हुईं जो पहले कभी नहीं हुई थी हिंदुस्तान के इतिहास में. तो वहां से मैच जितना और मेरा नाबाद मैच जीता के लाना और मैंने एक वर्ड का एक शब्द का इस्तेमाल किया बिलीफ. यार अगर आपके सामने बिल्कुल कोहरा छाया हुआ है ना कुछ नहीं दिख रहा है पर कोहरा कुछ लम्हों तक होता है, बस कोहरा भी छटता है बॉस आप बस जूझते रहो, लड़ाई करते रहो और हाथ पैर मारते रहो नेवर गिव अप. डोंट गिव अप लगे रहो परिश्रम करते रहो करते रहो लास्ट में क्या होता है 325 भी चेज होते हैं जो पहले इतिहास में कभी नहीं हुआ.

 

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