- पुलिस की प्रभावी जांच ने न्याय दिलाया, कानून सर्वोपरि।
श्रीनगर पुलिस एक पूर्व आतंकवादी को उसके पूर्व आतंकवादी कमांडर की हत्या करने के लिए उम्रकैद की सजा दिलाने में सफल रही है. पूर्व आतंकवादी को अदालत की तरफ से मिली सजा श्रीनगर पुलिस की मामले में बारीकी से की गई जांच और चार्जशीट दाखिल करने की कार्रवाई के बाद एक बड़ी कामयाबी मानी जा रही है.
जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज की अदालत ने गुलाम मोहि-उद-दीन डार को हत्या का दोषी ठहराया और उसे 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई. यह सजा पूर्व आतंकवादी कमांडर अब्दुल गनी डार की साल 2020 में हुई हत्या के मामले में सुनाई गई है, जो श्रीनगर के मैसूमा पुलिस स्टेशन में FIR नंबर 03/2020 के तहत दर्ज की गई थी.
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, 13 फरवरी, 2020 को दोपहर की नमाज (ज़ुहर) पूरी करने के तुरंत बाद डार पर मैसूमा (श्रीनगर) के गौकदल में मरकजी अहले हदीस मस्जिद के अंदर बेरहमी से हमला किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई थी. पोस्टमार्टम से पुष्टि हुई कि उसके सिर पर भारी चीज से घातक चोट लगी थी. जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में यह निष्कर्ष निकला कि उसकी हत्या आतंकवाद से जुड़ी घटना नहीं थी, बल्कि अपराधी गुलाम मोहि-उद-दीन डार के साथ पैसे को लेकर हुए कड़वे निजी वित्तीय विवाद और झगड़े का नतीजा थी.
कौन था मोहि-उद-दीन डार, जिसे कोर्ट ने सुनाई सजा?
अदालत ने सोमवार (10 अगस्त, 2026) को श्रीनगर के डलगेट इलाके के बुचवारा निवासी गुलाम मोहि-उद-दीन डार को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत अब्दुल गनी डार की हत्या का दोषी ठहराया.
गौरतलब है कि दोषी गुलाम मोहि-उद-दीन डार एक पूर्व आतंकवादी है और आतंकी संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन (TuM) के संस्थापक सदस्यों में से एक था. यह संगठन कश्मीर में ‘जमात-ए-अहल-ए-हदीस’ आंदोलन से जुड़ा एक आतंकवादी संगठन बनकर उभरा था. वहीं, पीड़ित अब्दुल गनी डार उर्फ अब्दुल्ला गजाली 78 वर्षीय प्रमुख इस्लामिक धर्मगुरु था और जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन (TuM) का पूर्व प्रमुख और शुरुआती कमांडर रह चुका था.
कई हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा था गजाली
गजाली मध्य कश्मीर के बडगाम जिले की बीरवाह तहसील के रुस्सू इलाके का रहने वाला था. अपने आतंकवादी दौर में, वो दो ग्रेनेड हमले, सुरक्षा चौकियों पर हमले, हथियार छीनने की घटनाएं और नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की लक्षित हत्याओं (टारगेटेड किलिंग) जैसी कई हिंसक गतिविधियों में शामिल रह चुका था.
हालांकि, अब्दुल गनी डार ने 90 के दशक की शुरुआत में अपनी गिरफ्तारी के बाद हिंसक आंदोलन छोड़ दिया था, लेकिन गुलाम मोहि-उद-दीन डार अपनी गिरफ्तारी से पहले 2000 के दशक तक लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन (HuM) जैसे आतंकी संगठनों को लॉजिस्टिकल सपोर्ट देने और उनके साथ नेटवर्क बनाने में शामिल रहा.
खुफिया एजेंसियों की थी गजाली पर कड़ी नजर
खुफिया एजेंसियों और स्थानीय पुलिस ने गजाली पर उग्रवाद से जुड़ी हाई-प्रोफाइल घटनाओं के सिलसिले में कड़ी नजर रखी थी. उसे 2011 में जमात-ए-अहले-हदीस के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना शौकत शाह की हत्या के मामले में सह-आरोपी के तौर पर गिरफ्तार किया गया और उस पर मुकदमा चला. मौलाना शौकत शाह की मौत उसी मैसूमा मस्जिद के बाहर हुए एक धमाके में हुई थी, जहां बाद में गजाली की भी हत्या कर दी गई.
जिस समय गुलाम मोहि-उद-दीन डार ने गजाली की हत्या की, उस समय वह उसी मामले में जमानत पर बाहर था. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने कहा कि यह सजा श्रीनगर पुलिस की बारीकी से की गई जांच और अदालत के सामने प्रभावी ढंग से मुकदमा चलाने का नतीजा है. यह दिखाता है कि किसी व्यक्ति का अतीत में उग्रवाद से जुड़ाव उसे कानून की पहुंच से बाहर नहीं करता है और आरोपी की पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, गंभीर आपराधिक मामलों में उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाती है. यह नतीजा श्रीनगर पुलिस की उस अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत वे पेशेवर जांच, वैज्ञानिक सबूतों और मुस्तैदी से मुकदमा चलाकर पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम करते हैं.
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