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शोरगुल में सिमटा मॉनसून सत्र! आखिरी दिन भी संसद में गतिरोध बरकरार रहने के आसार


Monsoon Session of Parliament: 20 जुलाई से शुरू हुआ संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को खत्म होना है, यानी कल सत्र का आखिरी दिन है. लेकिन पूरे सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव ने सदन की कार्यवाही को बुरी तरह प्रभावित किया है. एक तरफ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी गृह मंत्री अमित शाह से 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर सदन में जवाब मांग रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार का आरोप है कि विपक्ष चर्चा चाहता ही नहीं, बल्कि सदन को लगातार बाधित कर रहा है.

नतीजा यह है कि जिस संसद में जनता के मुद्दों पर बहस और समाधान होना चाहिए था, वहां लगातार नारेबाजी, हंगामा और स्थगन देखने को मिला. दरअसल, विवाद की शुरुआत 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर निकाले गए छात्रों के मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर हुई. विपक्ष का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किया गया और कुछ छात्रों को गंभीर चोटें आईं. इसी मुद्दे को लेकर राहुल गांधी लगातार गृह मंत्री अमित शाह से संसद के भीतर जवाब देने की मांग कर रहे हैं.

विपक्ष का कहना है कि गृह मंत्री को सदन में आकर पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यह बताना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की गई. राहुल गांधी ने इस मामले में एक घायल प्रदर्शनकारी छात्र को मीडिया के सामने भी पेश किया था. 19 वर्षीय साहिल लोचब के शरीर पर छर्रों के निशान होने का दावा किया गया. राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया और छात्र की दाईं आंख में छर्रा लगने से उसकी आंख को नुकसान पहुंचा.

हंगामे की भेंट चढ़ा सत्र

राहुल गांधी ने अपने आवास पर साहिल से हुई बातचीत का वीडियो भी जारी किया था. इसके बाद से ही यह मामला संसद में विपक्ष के विरोध का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है. विपक्ष की ओर से यह भी दावा किया गया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से कई लोग घायल हुए. समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने आरटीआई के हवाले से दावा किया कि पैलेट गन से 10 बच्चे घायल हुए हैं.

दूसरी तरफ सरकार और सत्तापक्ष लगातार इन आरोपों को लेकर विपक्ष से तथ्य और जवाब मांग रहा है. सरकार का कहना है कि 20 जुलाई की कार्रवाई के संबंध में उपलब्ध रिकॉर्ड और आधिकारिक जानकारी को देखा जाना चाहिए और पूरे मामले को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए. इसी बीच बुधवार को इस राजनीतिक टकराव में बड़ा मोड़ आया. दोपहर करीब 12 बजे गृह मंत्री अमित शाह मीडिया के सामने आए और उन्होंने कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है. अमित शाह ने विपक्ष को प्रस्ताव दिया कि बुधवार दोपहर 3 बजे से इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की जाए और वह गुरुवार दोपहर 3 बजे सदन में आकर विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देंगे.

शाह ने यह भी कहा कि चर्चा जितने समय तक चलानी हो, चलाई जाए और वह सभी सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं. अमित शाह के इस बयान के करीब 10 मिनट बाद राहुल गांधी की प्रतिक्रिया सामने आई. राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें कोई लेक्चर नहीं चाहिए, उन्हें अपने सवालों के जवाब चाहिए. विपक्ष की तरफ से यह सवाल उठाया गया कि अगर गृह मंत्री जवाब देने के लिए तैयार हैं तो 20 जुलाई की घटना के इतने दिनों बाद चर्चा की पेशकश क्यों की जा रही है.

वहीं सत्ता पक्ष का आरोप है कि विपक्ष पहले गृह मंत्री के सदन में आने की मांग कर रहा था और अब जब गृह मंत्री चर्चा के लिए तैयार हैं तो विपक्ष अपना रुख बदल रहा है. इसके बाद करीब पौने 3 बजे गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष को एक चिट्ठी भी लिखी. इसमें उन्होंने विपक्ष के साथ चर्चा के लिए समय और अवधि पर सहमति बनाने की अपील की. शाह ने कहा कि वह निर्धारित समय के दौरान सदन में मौजूद रहकर इस मुद्दे पर चर्चा में भाग लेना चाहते हैं और विपक्ष के सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तैयार हैं. लेकिन इसके बावजूद सदन में गतिरोध खत्म नहीं हुआ.

सरकार के खिलाफ विपक्ष का मोर्चा

दोपहर 3 बजे जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो उम्मीद थी कि शायद अब चर्चा का रास्ता खुलेगा, लेकिन विपक्ष का हंगामा जारी रहा. न तो चर्चा शुरू हो सकी और न ही सदन सामान्य तरीके से चल पाया. हंगामे के बीच कार्यवाही फिर स्थगित करनी पड़ी. यानी गृह मंत्री की ओर से चर्चा की पेशकश के बावजूद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहमति नहीं बन सकी. संसद के बाहर भी दोनों पक्षों का राजनीतिक प्रदर्शन जारी रहा. बुधवार सुबह विपक्षी सांसद संसद परिसर में अलग-अलग मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करते नजर आए. समाजवादी पार्टी के सांसद अयोध्या में चढ़ावे से जुड़े कथित मामले को लेकर दान पेटी के साथ प्रदर्शन करते रहे. कांग्रेस ने छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई और पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.

वहीं दूसरी तरफ झारखंड में छात्रों के विधानसभा मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी पर हमला बोला. बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों पर चयनात्मक राजनीति कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर राहुल गांधी वास्तव में छात्रों की आवाज उठाना चाहते हैं तो उन्हें झारखंड जाकर वहां प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों से भी मिलना चाहिए. इसी राजनीतिक खींचतान के बीच संसद परिसर में सत्ता पक्ष और विपक्ष के अलग-अलग नारे भी सुनाई दिए.

बीजेपी सांसद राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग करते नजर आए, जबकि विपक्षी सांसद गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी करते रहे. यानी जिस सदन में देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, महंगाई, सुरक्षा और आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए थी, वहां राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा दिखाई दिए. इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सरकार चर्चा के लिए तैयार थी तो चर्चा आखिर हो क्यों नहीं पाई और अगर विपक्ष को सरकार से जवाब चाहिए था तो सदन को चलने क्यों नहीं दिया गया. सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष की मंशा चर्चा करना नहीं बल्कि सरकार को घेरना और सदन को बाधित करना है. वहीं विपक्ष का तर्क है कि सरकार को पहले 20 जुलाई की घटना पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए और गृह मंत्री को सदन में आकर जवाब देना चाहिए. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू समेत सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने विपक्ष के रवैये पर सवाल उठाए हैं.

आखिरी दिन भी रहेगा गतिरोध?

सरकार का कहना है कि संसद जनता के पैसे से चलती है और सदन को बाधित करना देश के संसाधनों की बर्बादी है. विपक्ष का जवाब है कि सरकार अगर गंभीर मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है तो उसे विपक्ष की मांगों को स्वीकार करते हुए जवाब देना चाहिए. इस बीच संसद की कार्यवाही पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. आम तौर पर संसद की कार्यवाही के प्रति मिनट और प्रति घंटे खर्च के अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं. इसलिए इस मुद्दे पर किसी एक निश्चित आंकड़े को आधिकारिक तथ्य के रूप में पेश करने से पहले स्रोत की पुष्टि जरूरी है. हालांकि इतना साफ है कि सदन की कार्यवाही बाधित होने से संसदीय समय का नुकसान होता है और इसका सीधा असर उस कामकाज पर पड़ता है जिसके लिए संसद का सत्र बुलाया जाता है.

मॉनसून सत्र के आखिरी दिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष किसी समझौते पर पहुंचेंगे या फिर गतिरोध आखिरी दिन भी जारी रहेगा. लोकतंत्र में विरोध और असहमति जरूरी है. विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और जवाब मांगना है, जबकि सरकार की जिम्मेदारी उन सवालों का जवाब देना है. लेकिन सवाल और जवाब की यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया तभी पूरी हो सकती है, जब सदन में चर्चा हो. अगर चर्चा की जगह सिर्फ नारेबाजी और स्थगन रह जाए तो नुकसान किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था और जनता के समय का होता है. आखिरकार सवाल यही है कि संसद में जवाब चाहिए तो चर्चा जरूरी है और चर्चा चाहिए तो सदन चलना भी जरूरी है. अब देखना होगा कि मॉनसून सत्र के आखिरी दिन राहुल गांधी बनाम अमित शाह की यह राजनीतिक जंग किसी समाधान तक पहुंचती है या संसद का आखिरी दिन भी हंगामे की भेंट चढ़ जाता है.



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