14 मार्च 2025 की रात को दिल्ली के तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले में आग लग गई. दमकल कर्मियों ने आग बुझाई तो स्टोर रूम से जले और अधजले 500 के नोटों के ढेर मिले. यह घटना देश की न्यायपालिका के इतिहास में सबसे बड़े विवादों में से एक बन गई. अब 12 अगस्त 2026 को इस मामले की संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में पेश कर दी गई. तीनों आरोप साबित पाए गए हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहले ही इस्तीफा दे चुके जस्टिस वर्मा के खिलाफ आगे क्या होगा- इम्पीचमेंट या FIR…
जस्टिस वर्मा ने क्या किया इस्तीफा?
9 अप्रैल 2026 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया. जस्टिस वर्मा ने अपने फैसले के पीछे के कारणों से राष्ट्रपति के कार्यालय को ‘बोझ’ न डालने की बात कही. लेकिन इस्तीफा अधिसूचित नहीं हुआ है और यहीं सबसे बड़ा कानूनी पेंच है.
नियम: हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज का इस्तीफा उसी दिन प्रभावी हो जाता है जिस दिन वह राष्ट्रपति को संबोधित किया जाता है, भले ही राष्ट्रपति मंजूर न करें. लेकिन 1978 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक, जज ‘माना जाता है कि उसने इस्तीफा दे दिया’ एक बार जब वह राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपता है और उसकी कॉपी सार्वजनिक करता है. राष्ट्रपति ‘औपचारिक स्वीकृति’ देते हैं, जिसके बाद कानून मंत्रालय का कार्मिक विभाग अधिसूचना जारी करता है.
अब तक जस्टिस वर्मा का इस्तीफा अधिसूचित ही नहीं हुआ. उनका नाम अभी भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों की सूची में है. सूत्रों के मुताबिक, चूंकि इस्तीफा संसद में हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद भेजा गया था, इसलिए इसे अभी स्वीकार नहीं किया गया है.
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने जिस तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था, उसने 12 अगस्त 2026 को अपनी 126-पेज की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी. समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे तीनों आरोपों को साबित करार दिया है.
रिपोर्ट पेश होने के बाद अब आगे क्या होगा, इस पर कानूनी विशेषज्ञों में गहरा मतभेद है. लेकिन एक बात पर लगभग सबकी सहमति है कि अब FIR दर्ज हो सकती है.
जस्टिस वर्मा केस में आगे होगा क्या?
कानून के जानकार और वकीलों के मुताबिक:
1. इम्पीचमेंट (महाभियोग): सरकार कोशिश कर रही
सरकार शीतकालीन सत्र (दिसंबर 2026) में इम्पीचमेंट मोशन लाने पर विचार कर रही है. वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह कहते हैं, ‘जब तक इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ, जस्टिस वर्मा को महाभियोग किया जा सकता है. इस्तीफे की स्थिति में उन्हें पेंशन मिलेगी, जबकि महाभियोग की स्थिति में पेंशन नहीं मिलेगी.’ सरकार यह मिसाल कायम करना चाहती है कि कोई जज गंभीर अनियमितताओं के बाद इस्तीफा देकर हटाने की प्रक्रिया से नहीं बच सकता.
2. इम्पीचमेंट संभव नहीं: वकीलों का एक बड़ा तबका
वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी कहते हैं, ‘अब रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता. इम्पीचमेंट मोशन ‘खत्म हो चुका है.’ मेरे विचार में यह निष्क्रिय हो गया है.’
वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन कहते हैं, ‘मेरे विचार में संसद ने अपनी अधिकारिता खो दी है. इम्पीचमेंट का सवाल ही नहीं उठता. महाभियोग संभव नहीं है क्योंकि जिस पद से उन्हें हटाना है, वह पद वे अब धारण नहीं करते, ऐसे में संसद मोशन पर विचार नहीं कर सकती.’
3. FIR: लगभग सभी वकीलों की सहमति
इस पर सबसे ज्यादा सहमति है. जज की प्रतिरक्षा खत्म हो चुकी है.
- राकेश द्विवेदी कहते हैं, ‘इस रिपोर्ट के आधार पर निश्चित रूप से FIR दर्ज की जा सकती है.’
- राजीव धवन कहते हैं, ‘जब वे जज थे, तो CJI की अनुमति लेना जरूरी था क्योंकि उन्हें जज के रूप में प्रतिरक्षा हासिल थी. लेकिन वह प्रतिरक्षा अब खत्म हो गई है.’
- इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी कहते हैं, ‘जजों को प्रतिरक्षा उन्हें न्यायिक शक्तियों के भीतर स्वतंत्र रूप से कार्य करने की स्वतंत्रता देती है, लेकिन इतना पैसा घर पर रखने की इजाजत नहीं देती.’
लेकिन एक अलग राय वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की है. वे कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि इस पैनल की रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज की जा सकती है. पैनल ने पूरा दायित्व जस्टिस वर्मा पर डाल दिया कि वे बताएं कि पैसे कहां से आए.’
4. सुप्रीम कोर्ट ने FIR की मांग वाली याचिका खारिज कर दी
7 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR और SIT जांच की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया और इसे ‘सस्ता प्रचार’ करार दिया. राकेश द्विवेदी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट का यह खारिज करना अब कोई बाधा नहीं है क्योंकि रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है.
जस्टिस वर्मा के घर से कैश मिलने का मामला क्या था?
दिल्ली के तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस वर्मा (तब दिल्ली हाईकोर्ट के जज) के सरकारी आवास में आग लग गई. दमकल कर्मियों ने आग बुझाई तो स्टोर रूम से 500 के नोटों के ढेर मिले. आग बुझने के बाद स्टोर रूम को तुरंत सील नहीं किया.
रात करीब 3 बजे जस्टिस वर्मा के निजी सचिव और सहायक को स्टोर रूम की सफाई करते देखा गया. सुबह तक जला हुआ सामान बाहर निकाल दिया गया. कॉल डिटेल से पता चला कि जस्टिस वर्मा (जो उस समय शहर से बाहर थे) रात भर अपने सचिव और सहायक के संपर्क में थे.
तीन आरोप और समिति का निष्कर्ष
समिति ने 126-पेज की रिपोर्ट में तीनों आरोप साबित पाए:
- बेहिसाब नकदी: स्टोर रूम में 500 रुपए के नोटों का ढेर मिला, जस्टिस वर्मा संतोषजनक जवाब नहीं दे सके.
- सबूतों से छेड़छाड़: स्टोर रूम को सील नहीं किया, सबूत गायब हो गए.
- टालमटोल वाले जवाब: जस्टिस वर्मा के जवाब ‘अधूरे, टालमटोल वाले और भ्रामक’ पाए गए.
समिति ने स्पष्ट किया कि नकदी व्यक्तिगत रूप से जस्टिस वर्मा की थी, इसका ठोस सबूत नहीं है. लेकिन उनके कब्जे वाले सरकारी आवास में इतनी बड़ी नकदी मौजूद थी और वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके.
