सावन के पावन महीने में देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में जमड़ार नदी के किनारे स्थित प्राचीन कुंडेश्वर धाम बुंदेलखंड का सबसे प्रमुख आस्था केंद्र माना जाता है. वैसे तो इस क्षेत्र में कोई आधिकारिक ज्योतिर्लिंग दर्ज नहीं है, फिर भी करोड़ों भक्त इसे देश के 13वें ज्योतिर्लिंग के समान पूजते हैं. इस पवित्र स्थान से जुड़े कई अलौकिक चमत्कार आज भी लोगों को पूरी तरह आश्चर्यचकित कर देते हैं.

इस पावन धाम के प्राकट्य का इतिहास लगभग 850 साल पुराना है. संवत 1204 के समय इस पहाड़ी क्षेत्र में धंतीबाई नामक एक महिला रहती थी. एक दिन जब वह जमीन में बनी प्राकृतिक ओखली में धान कूट रही थी, तभी मूसल की अचानक चोट लगने से ओखली के भीतर से खून की धारा बहने लगी. यह भयानक दृश्य देखकर महिला घबरा गई और उसने तुरंत उस ओखली को मिट्टी के एक बड़े बर्तन से अच्छी तरह ढक दिया.

इसके बाद जब ग्रामीणों ने मौके पर आकर वह बर्तन हटाया, तो वहां चावल के दाने के बराबर एक नन्हा शिवलिंग धरती से प्रकट होता दिखाई दिया. शुरुआत में मिट्टी के बर्तन से ढके होने के कारण इन्हें कूड़ा देव कहा गया, परंतु बाद में कुंड के किनारे होने से यह कुंडेश्वर महादेव कहलाए. चंदेल राजा मदन वर्मन ने यहां भव्य मंदिर बनवाया था. मंदिर परिसर में स्थापित नंदी की प्रतिमा पर आज भी संवत 1204 स्पष्ट रूप से लिखा मिलता है.

स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं की गहरी मान्यता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग प्रतिवर्ष एक चावल के दाने के बराबर अपने आप बढ़ता है. जो शिवलिंग कभी बेहद सूक्ष्म रूप में प्रकट हुआ था, वह आज समय के साथ एक विशाल और भव्य स्वरूप ले चुका है. हर साल सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर इस चमत्कारी रूप के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु टीकमगढ़ पहुंचते हैं और मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं.

शिवलिंग की वास्तविक गहराई जानने के लिए वर्ष 1937 में टीकमगढ़ रियासत के राजा वीर सिंह जूदेव ने यहां गर्भगृह में विशेष खुदाई करवाई थी. लगभग पच्चीस फीट की गहराई तक खोदने पर हर कुछ फीट के अंतराल में कुल सात नई जलहरियां बाहर निकलीं, परंतु शिवलिंग का अंत नहीं मिल सका. बाद में जमीन से पानी का तेज फव्वारा फूटने और राजा को स्वप्न आने के बाद इस खुदाई को पूरी तरह रोक दिया गया.

इस पौराणिक धाम का संबंध द्वापर युग से भी जोड़ा जाता है. मान्यता के अनुसार दैत्यराज बाणासुर की पुत्री राजकुमारी ऊषा इसी घने वन क्षेत्र में आकर भगवान शिव की गुप्त रूप से कठिन साधना किया करती थीं. स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि आज भी रोज सुबह मंदिर के कपाट खुलने से पहले कोई अदृश्य शक्ति सबसे पहले महादेव का जलाभिषेक कर जाती है, जिसे भक्त राजकुमारी ऊषा की नियमित पूजा मानते हैं.
Published at : 19 Aug 2026 11:49 AM (IST)
