राजस्थान के सिरोही जिले में डाक विभाग से जुड़ा एक कथित रिश्वत मांगने का मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. आबूरोड क्षेत्र के आवल BO में कार्यरत एक कार्मिक ने आरोप लगाया है कि विभागीय कार्यवाही के दौरान उसे रिकॉर्ड में कथित गलती को लेकर कार्रवाई का डर दिखाया गया और बाद में ‘खर्चा-पानी’ के नाम पर 5 हजार रुपये की मांग की गई.
शिकायतकर्ता का दावा है कि रकम मांगते समय उसे यह बताया गया कि इस संबंध में ‘सुप्रिडेंट साहब से बात हो चुकी है’. हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है. संबंधित अधिकारियों के बयान भी सामने आए हैं, जिसके बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग और तेज हो गई है.
रिकॉर्ड में कथित गलती को लेकर कार्रवाई का डर दिखाने का आरोप
आवल BO में कार्यरत कार्मिक अमित के अनुसार, मदन नामक अधिकारी विभागीय विजिट के सिलसिले में आए थे. शिकायतकर्ता का आरोप है कि कार्यालय में विजिट करने के बजाय उसे रिकॉर्ड लेकर मूंगथला बुलाया गया.
इसके बाद रिकॉर्ड की जांच के दौरान RD खाते से संबंधित प्रविष्टि में कथित गलती सामने आने की बात कही गई. शिकायतकर्ता के मुताबिक, उसे इस गलती को लेकर गंभीर कार्रवाई और ‘फ्रॉड’ में फंसने की आशंका जताई गई तथा वरिष्ठ अधिकारी से बात करने की बात कही गई. आरोप है कि इसके बाद उसे फोन पर कथित तौर पर कहा गया कि सुप्रिडेंट साहब से बात हुई है, खर्चा-पानी देना होगा.
राजस्थान का वो स्कूल जहां CJP के आशुतोष के जाने पर मचा हंगामा, है बहुत बुरा हाल
5 हजार रुपये की कथित मांग
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उससे 5 हजार रुपये देने को कहा गया. अमित के मुताबिक, जब उसने ऑनलाइन भुगतान करने की बात कही तो कथित तौर पर नकद रकम देने के लिए कहा गया. शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया कि रकम नहीं देने की स्थिति में उसके खिलाफ कार्रवाई, पुटअप किए जाने और नौकरी से हटाए जाने का भय दिखाया गया. हालांकि इसपर मदन ने बताया आरोपों से किनारा कर दिया बोले की ऐसी कोई बात नहीं है.
फिलहाल इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है. इसलिए किसी भी व्यक्ति को आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा. पूरे मामले की वास्तविकता निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी.
‘मीडिया में पक्ष रखने के लिए अधिकृत नहीं’
मामले में आबूरोड IPO महेश मीना से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया. आरोपों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मैं मीडिया में पक्ष रखने के लिए अधिकृत नहीं हूं.
उनके इस बयान के बाद मामले में विभागीय स्तर पर आधिकारिक प्रतिक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. खासकर तब, जब शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर वरिष्ठ अधिकारी के नाम का हवाला देकर रकम मांगे जाने का आरोप लगाया है.
डाक अधीक्षक बोले- मेरे पास ऐसी कोई शिकायत नहीं आई
पूरे मामले पर सिरोही डाक विभाग के अधीक्षक अखाराम से भी प्रतिक्रिया ली गई. उन्होंने कहा कि ‘मेरे पास ऐसी कोई शिकायत नहीं आई और मुझे इस शिकायत के संदर्भ में कुछ पता नहीं है.’
डाक अधीक्षक के इस बयान के बाद मामले का एक अहम पहलू सामने आता है. शिकायतकर्ता जहां कथित तौर पर अधीक्षक से बात होने का हवाला देकर रकम मांगे जाने का आरोप लगा रहा है, वहीं अधीक्षक स्वयं ऐसी किसी शिकायत या मामले की जानकारी होने से इनकार कर रहे हैं.
अधीक्षक के नाम का इस्तेमाल हुआ तो जिम्मेदारी किसकी?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं और किसी कार्मिक से वरिष्ठ अधिकारी के नाम का इस्तेमाल कर रकम मांगी गई, तो ऐसा करने वाले व्यक्ति की भूमिका क्या थी?
- क्या किसी अधिकारी के नाम का इस्तेमाल कर विभागीय स्तर पर दबाव बनाया गया?
- क्या इस संबंध में कोई शिकायत विभाग के उच्च अधिकारियों तक पहुंची?
- और यदि शिकायत नहीं पहुंची, तो विभाग की आंतरिक निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
आरोप सही या गलत, निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा सच
इस पूरे प्रकरण में फिलहाल दोनों पक्षों के बयान सामने हैं. शिकायतकर्ता ने कथित रिश्वत मांगने और दबाव बनाए जाने के आरोप लगाए हैं, जबकि डाक अधीक्षक ने ऐसी किसी शिकायत की जानकारी होने से इनकार किया है.
ऐसे में पूरे मामले में निष्पक्ष विभागीय जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. जांच के दौरान शिकायतकर्ता के आरोप, कथित बातचीत, संबंधित रिकॉर्ड और घटनाक्रम से जुड़े अन्य तथ्यों की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में क्या हुआ था.
अब उच्चाधिकारियों के संज्ञान पर निगाहें
मामला सामने आने के बाद अब निगाहें राजस्थान डाक विभाग के उच्चाधिकारियों पर हैं. सवाल है कि क्या विभाग इस प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराएगा? यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा. वहीं, यदि आरोपों में तथ्य नहीं पाए जाते हैं, तो विभाग आधिकारिक जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट कर सकता है.
भ्रष्टाचार के आरोपों में पारदर्शी जांच जरूरी
सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार या रिश्वत मांगने से जुड़े आरोप सीधे तौर पर प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता के विश्वास से जुड़े होते हैं. ऐसे मामलों में आरोपों को अंतिम सत्य मानना भी उचित नहीं है और उन्हें बिना जांच के नजरअंदाज करना भी नहीं.
सिरोही डाक विभाग से जुड़े इस मामले में अब सबसे अहम सवाल यही है कि जांच कब होगी, जांच का दायरा क्या होगा और जांच के बाद विभाग की ओर से क्या कार्रवाई की जाएगी?
फिलहाल 5 हजार रुपये की कथित मांग से शुरू हुआ यह मामला अब विभागीय जवाबदेही, निगरानी व्यवस्था और वरिष्ठ अधिकारी के नाम के कथित इस्तेमाल तक पहुंच गया है. अब देखना होगा कि डाक विभाग के उच्चाधिकारी इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और जांच के बाद सच्चाई क्या सामने आती है.
आशुतोष रांका शिक्षा मंत्री मदन दिलावर पर भड़के, ‘आपका टाइम…’
