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वंदे मातरम: सॉलिसिटर जनरल के ‘नक्सली’ वाले बयान पर भड़के ओवैसी, बोले – ‘मजबूर नहीं…’


AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मंगलवार (22 सितंबर, 2026) को राष्ट्रगीत वंदे मातरम से जुड़ी कानूनी वैधता को अदालत में चुनौती देने वाले लोगों पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तरफ से की गई टिप्पणी को लेकर उनकी आलोचना की है. दरअसल, सॉलिसिटर जनरल ने उन लोगों को नक्सली कहा था, जिन्होंने वंदे मातरम का सम्मान न करने पर सजा देने वाले कानून की वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

ओवैसी ने X पोस्ट में क्या कहा?

हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अपने X पोस्ट में कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए एक अहम बात कही थी कि किसी व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि उसने इसे गाने से इनकार कर दिया, अगर उसका जमीर इसकी इजाजत नहीं देता.’ उन्होंने कहा कि असहमति की आजादी, सोच, भाषण और अभिव्यक्ति की आजादी का एक जरूरी हिस्सा है.

क्या है पूरा मामला?

ओवैसी की यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस बात के बाद आई है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि किसी को भी ‘वंदे मातरम’ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अगर यह उनके जमीर के खिलाफ हो. कोर्ट राष्ट्रीय गीत का सम्मान न करने पर सजा देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था. 

वहीं, सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने याचिका का विरोध करते हुए कथित तौर पर ‘नक्सली’ वाली टिप्पणी की थी. ओवैसी ने सवाल उठाया कि देश का दूसरा सबसे बड़ा कानून अधिकारी नागरिकों के खिलाफ ऐसी भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकता है, जबकि वे सिर्फ अदालत जाने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहे थे.

इस मुद्दे पर सरकार के रुख के मुखर आलोचक रहे ओवैसी 

AIMIM प्रमुख ओवैसी इस मुद्दे पर सरकार के रुख के मुखर आलोचक रहे हैं. उन्होंने अपने पोस्ट में 22 सितंबर, 1999 की घटनाओं का भी जिक्र किया और इसे ‘लाठीचार्ज’ की बरसी बताते हुए राजनीतिक फ़्लैशबैक कहा. उन्होंने लगातार तर्क दिया है कि देशभक्ति को कोई गाना गाकर नहीं मापा जा सकता और संविधान असहमति के अधिकार की गारंटी देता है. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को जमीर और अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में एक अहम कदम माना जा रहा है.

मामले पर कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है और राजनीतिक दल के साथ नागरिक समाज के संगठन इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं. कोर्ट की इस टिप्पणी का स्वागत उन लोगों ने किया है, जो इसे संवैधानिक आजादी की फिर से पुष्टि के तौर पर देखते हैं कि अगर किसी का जमीर इजाजत न दे तो वंदे मातरम न गाने पर उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. सरकार ने अभी तक कोर्ट की टिप्पणियों पर औपचारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. मामले में और सुनवाई होनी बाकी है. 

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