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Explained: क्या ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त हैं? पिछले 8 सालों में दिवाली के अगले दिन क्या रही एयर क्वालिटी


आगामी त्योहारों के सीजन से पहले सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों के इस्तेमाल और नियमन पर एक “व्यावहारिक और यथार्थवादी” दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत पर जोर दिया है. दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में लगातार गहराते वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगी. इस न्यायिक पहल ने एक बार फिर ‘ग्रीन क्रैकर्स’ की भूमिका और दिल्ली-एनसीआर की आबो-हवा पर उनके प्रभाव को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

क्या होते हैं ‘ग्रीन पटाखे’?

पारंपरिक पटाखों में धमाका, तेज रोशनी और रंग पैदा करने के लिए ईंधन, ऑक्सीडाइज़र और भारी धातु लवणों का मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है. इसके विपरीत, ग्रीन पटाखे वैज्ञानिक रूप से संशोधित मिश्रण का उपयोग करते हैं.

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (CSIR-NEERI) द्वारा विकसित फॉर्मूले के तहत इन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले हानिकारक रसायनों को बदला जाता है या उनकी मात्रा को काफी हद तक कम कर दिया जाता है. प्रामाणिक ग्रीन पटाखों पर एक विशेष ‘ग्रीन लोगो’ और ‘QR कोड’ होता है, जिससे उपभोक्ता उनकी प्रामाणिकता की जांच कर सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही बेरियम और बेरियम सॉल्ट वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया था. बेरियम नाइट्रेट जैसे रसायन ऑक्सीडाइजर के रूप में काम करते हैं और पटाखों में हरा रंग पैदा करने के लिए जाने जाते हैं, जो जलने पर अत्यधिक विषैला धुआं छोड़ते हैं.

केंद्र सरकार का पक्ष और अदालती प्रक्रिया

केंद्र सरकार ने अदालत को सूचित किया है कि पर्यावरण मंत्रालय ने CSIR-NEERI, पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के विशेषज्ञों की सलाह पर नए डिजाइन वाली ‘लड़ियों’ (पटाखों की श्रृंखला) को सशर्त मंजूरी देने की सिफारिश की है.

‘लड़ी’ में छोटे पटाखे एक कतार में जुड़े होते हैं, जिन्हें 2018 में प्रतिबंधित कर दिया गया था. अदालत ने इस सिफारिश को स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन शेल्स की संख्या, उनके आकार और विस्फोट के बीच के समय पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं.

केंद्र सरकार के अनुसार, CSIR-NEERI द्वारा प्रयोगशालाओं में किए गए परीक्षणों में पाया गया कि बेरियम और नाइट्रेट की कम मात्रा वाले नए ग्रीन पटाखों के जलने से PM10 कणों के उत्सर्जन में 45% से 60% तक की कमी आती है. इसके अलावा, CPCB और NEERI ने दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों में आउटडोर (खुले वातावरण में) परीक्षण करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि वास्तविक परिस्थितियों में हवा की गुणवत्ता पर इनके प्रभाव का सटीक आकलन किया जा सके.

क्या ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त हैं?

प्रयोगशाला परीक्षणों में उत्सर्जन भले ही कम दर्ज किया गया हो, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि ग्रीन पटाखे प्रदूषण को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते.

CPCB की एयर लैब के पूर्व प्रमुख दीपांकर साहा के अनुसार, “जिस भी प्रक्रिया में दहन या जलना शामिल होता है, वह कभी भी 100% ‘ग्रीन’ या प्रदूषण-मुक्त नहीं हो सकती.” ग्रीन पटाखे केवल पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम विषैले होते हैं क्योंकि इनमें बेरियम या एल्युमीनियम जैसे घातक रसायनों की मात्रा को नियंत्रित या प्रतिस्थापित किया जाता है.

दिवाली के दौरान दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI)

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े दर्शाते हैं कि त्यौहारों के दौरान दिल्ली की वायु गुणवत्ता लगातार चिंताजनक बनी रहती है. दिवाली के दिन दिल्ली का 24 घंटे का औसत AQI वर्ष-दर-वर्ष इस प्रकार रहा है.

-2018: 281 (खराब)

-2019: 337 (बहुत खराब)

-2020: 414 (गंभीर)

-2021: 382 (बहुत खराब)

-2022: 312 (बहुत खराब)

-2023: 218 (खराब – अनुकूल मौसम के कारण)

-2024: 328 (बहुत खराब)

-2025: 345 (बहुत खराब)

बता दें कि 0 से 500 के पैमाने पर 301-400 को ‘बहुत खराब’ और 400 से ऊपर को ‘गंभीर’ माना जाता है. 2020 से 2024 के दौरान दिल्ली सरकार द्वारा सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बावजूद नियमों के उल्लंघन और अवैध पटाखों की बिक्री के कारण दिवाली के बाद प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंचता रहा.

मौसम की भूमिका और PM2.5 का बढ़ता संकट

प्रदूषकों के बिखराव और ठहराव में मौसम संबंधी परिस्थितियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं. उदाहरण के लिए, 2023 में अनुकूल मौसमी दशाओं के कारण दिवाली पर AQI 218 दर्ज किया गया था, हालांकि आतिशबाजी के बाद पार्टिकुलेट मैटर (PM) का स्तर तेजी से बढ़ गया था.

2025 में, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में केवल सर्टिफाइड ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति दी, तब भी दिवाली की रात दिल्ली के 38 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से अधिकांश ‘रेड ज़ोन’ में आ गए.

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2025 में अनुकूल मौसम के बावजूद दिवाली के दौरान PM2.5 का औसतन स्तर पिछले पांच वर्षों में सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. दिल्ली के आठ प्रमुख निरंतर निगरानी केंद्रों पर औसत PM2.5 का स्तर 785.6 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया. नेहरू नगर (1,763 माइक्रोग्राम/घन मीटर) और आनंद विहार (1,710 माइक्रोग्राम/घन मीटर) जैसे इलाकों में प्रति घंटे का औसतन PM2.5 स्तर स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक स्थिति में पहुंच गया था.



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