27 अक्टूबर 2026 को होने वाले इजराइल के संसदीय चुनावों को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना कम ही है. 120 सीटों वाली इज़रायली संसद ‘नेसेट’ में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होगी. अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा धड़ा यह बहुमत जुटा पाता है.
‘अल जज़ीरा’ और ‘द इंडिपेंडेंट’ के जनमत सर्वेक्षणों और विश्लेषणों के आधार पर, इन चुनावों के 5 संभावित परिदृश्य उभरकर सामने आ रहे हैं:
नेतन्याहू के नेतृत्व में फिर दक्षिणपंथी सरकार
ओपिनियन पोल में थोड़े पिछड़ने के बावजूद, प्रधानमंत्री नेतन्याहू सत्ता बनाए रख सकते हैं. यदि उनकी ‘लिकुड’ पार्टी और उनके स्वाभाविक सहयोगी दल 61 सीटों का आंकड़ा पार कर लें. इसमें इतामार बेन-गवीर की ‘ज्यूइश पावर’, बेज़ालेल स्मोट्रिच की ‘रिलिजियस ज़ायोनिज़्म’ जैसी कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियां और ‘शास’ व ‘यूनाइटेड तोराह जुडाइज़्म’ जैसी अति-रूढ़िवादी (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स/हारेदी) पार्टियां शामिल हैं.
अक्टूबर 2026 के ताजा सर्वेक्षणों के अनुसार, यह ब्लॉक बहुमत के करीब पहुँचता दिख रहा है और इसे 52 से 54 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है.
विपक्ष के नेतृत्व वाली बहुमत सरकार
नेतन्याहू-विरोधी दल इतनी सीटें हासिल कर लें कि वे एक साझा मोर्चा बनाकर मौजूदा प्रधानमंत्री को सत्ता से बाहर कर सकें. सितंबर 2026 के अंत में विपक्ष के प्रमुख धड़ों ‘यशार’ पार्टी, ‘डेमोक्रेट्स’, ‘यिसरायल बेतेनु’ और ‘टुगेदर’ गठबंधन ने एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार न करने के लिए ‘गैर-आक्रमण समझौता’ किया है.
विपक्ष से प्रधानमंत्री पद के मुख्य दावेदारों में ‘यशार’ पार्टी के नेता व पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट और ‘टुगेदर’ गठबंधन के सह-नेता नफ्ताली बेनेट शामिल हैं. हालांकि ‘यशार’ पार्टी 20 सीटों के साथ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभर सकती है, लेकिन उदारवादी दलों को 61 सीटों तक पहुंचने के लिए बाहरी समर्थन की जरूरत पड़ सकती है.
‘राष्ट्रीय एकता सरकार’
यदि चुनाव के बाद गहरा राजनीतिक गतिरोध पैदा होता है और कोई भी बड़ा गुट बहुमत का आंकड़ा (61 सीटें) नहीं छू पाता, तो विरोधी दलों को एक आपातकालीन एकता सरकार बनानी पड़ सकती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग नेतन्याहू और आइज़ेनकोट के बीच के मतभेदों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. अक्टूबर 2026 के पोल के अनुसार, लगभग 55% इजरायली नागरिक बार-बार चुनाव कराने के बजाय एक ‘राष्ट्रीय एकता सरकार’ के पक्ष में हैं.
अरब पार्टियों के समर्थन से गठबंधन सरकार
विपक्षी गठबंधन 61 सीटों से थोड़ा पीछे रह जाए, लेकिन इज़राइली-अरब पार्टियों के सहयोग से सरकार बना ले.
‘राअम’ (Ra’am) यानी ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ के नेता मंसूर अब्बास ने विपक्षी गठबंधन में शामिल होने का संकेत दिया है.
‘जॉइंट लिस्ट’ कैबिनेट में शामिल हुए बिना, बाहर से समर्थन दे सकती है जैसे अविश्वास प्रस्ताव के समय निष्पक्ष रहकर या विपक्ष के पक्ष में मतदान करके.
हालांकि, गादी आइसेनकोट जैसे मुख्य विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन की संभावना से इनकार किया है.
जारी गतिरोध और फिर से चुनाव
यदि तय कानूनी समय-सीमा के भीतर न तो नेतन्याहू और न ही विपक्ष 61 सीटों का गठबंधन बना पाता है, तो देश एक बार फिर अनिश्चितता में फंस जाएगा.
राष्ट्रपति हर्ज़ोग किसी एक नेता को सरकार बनाने का न्योता देंगे. उन्हें 28 दिन (जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय) मिलेंगे. यदि प्रयास विफल रहते हैं, तो संसद (नेसेट) भंग हो जाएगी और देश में दोबारा चुनाव कराने होंगे. (यह स्थिति 2019 से 2022 के बीच हुए उन 5 लगातार चुनावों की याद दिलाती है.)
क्या ईरान युद्ध चुनाव नतीजों पर असर डालेगा?
27 अक्टूबर 2026 के चुनावों में जारी क्षेत्रीय संघर्ष नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है और उनके बचाव का सबसे बड़ा हथियार भी. 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद यह पहला आम चुनाव है.
7 अक्टूबर की विफलता और जवाबदेही: आलोचकों और विपक्षी नेता गादी आइसेनकोट का आरोप है कि खुफिया और सुरक्षा विफलता के कारण ही 7 अक्टूबर के हमले संभव हुए. लंबे खिंचते संघर्ष और बंधकों की अनसुलझी स्थिति से जनता में असंतोष है, जिससे लिकुड पार्टी को कड़ी चुनौती मिल रही है.
‘युद्धकालीन नेता’ की छवि: इसके विपरीत, नेतन्याहू खुद को एक सख्त और मजबूत ‘वारटाइम लीडर’ के रूप में पेश कर रहे हैं. जून 2025 में ईरान के साथ 12 दिनों के सैन्य अभियान के बाद उनकी लोकप्रियता में सुधार देखा गया था. सुरक्षा संकट के चलते मतदाताओं का रुझान दक्षिणपंथ की ओर बढ़ा है. नेतन्याहू का तर्क है कि केवल उनका कड़ा रुख ही ईरान और उसके सहयोगियों को करारा जवाब दे सकता है.
भले ही तीन साल से जारी इस युद्ध ने नेतन्याहू के वोट बैंक में सेंध लगाई हो और जांच की मांग तेज की हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उनका कड़ा रुख उन्हें सत्ता की दौड़ में मजबूती से बनाए हुए है.
