हुर्रियत के पूर्व चेयरमैन और मीरवाइज-ए-कश्मीर मौलवी उमर फारूक ने ‘इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप’ की हाल ही में जारी रिपोर्ट का जिक्र कर कहा कि ‘जम्मू-कश्मीर में हिंसा का कम होना स्वागत योग्य है, लेकिन इसे स्थायी शांति नहीं माना जा सकता. लोगों का भरोसा फिर से जीतने के लिए न्याय, सुलह, नागरिक स्वतंत्रता की बहाली और सार्थक राजनीतिक बातचीत बहुत जरूरी है.’
मीरवाइज ने अपने संबोधन में कहा, ‘इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप – जो संघर्ष को रोकने और सुलझाने के क्षेत्र में काम करने वाला एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठन है – ने पिछले हफ्ते जम्मू-कश्मीर पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है. मेरा मानना है कि इसके निष्कर्षों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए.’
मीरवाइज ने बताया कि रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के वर्षों में उग्रवाद, सड़कों पर होने वाले विरोध-प्रदर्शन और हिंसा में कमी आई है, जो कि एक अच्छी बात है. कश्मीर के लोगों ने पिछले कई दशकों में बहुत कुछ सहा है, इसलिए वे शांति की अहमियत को अच्छी तरह समझते हैं. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में एक अहम बात यह भी कही गई है कि हिंसा में कमी आने का मतलब यह नहीं है कि लोगों की राजनीतिक शिकायतें दूर हो गई हैं या जनता का भरोसा फिर से बहाल हो गया है.
मीरवाइज ने कहा कि सुरक्षा जरूरी है और लोगों की जान बचाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सिर्फ सुरक्षा उपायों से किसी ऐसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता, जिसके गहरे राजनीतिक और मानवीय पहलू भी हों.
कश्मीर में दुनिया की सबसे अधिक सैन्य उपस्थिति
जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार को राज्य का दर्जा वापस देने की मांग करते हुए, मीरवाइज ने कहा कि एक चुनी हुई सरकार होने के बावजूद, कश्मीर दुनिया की सबसे अधिक सैन्य उपस्थिति वाले इलाकों में से एक बना हुआ है. उन्होंने आगे कहा कि रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक बातों में से एक 2019 के बाद से हुई गिरफ्तारियों और हिरासत की बड़ी संख्या है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच जम्मू-कश्मीर में UAPA (यूएपीए) के तहत 3,662 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि इस दौरान केवल 23 लोगों को ही दोषी ठहराया जा सका. उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों ने लंबे समय तक हिरासत में रखने, उचित कानूनी प्रक्रिया और कड़े कानूनों के व्यापक इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
कश्मीर में राजनीतिक गिरफ्तारियां
मीरवाइज ने कहा कि हजारों परिवार गिरफ्तारियों, हिरासत और लंबी कानूनी कार्रवाई के नतीजों को भुगत रहे हैं और अपने प्रियजनों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता के बीच जी रहे हैं. उन्होंने कश्मीरी राजनीतिक कैदियों, जिनमें यासीन मलिक, शब्बीर अहमद शाह, शाहिद उल इस्लाम, इंजीनियर रशीद, आसिया अंद्राबी और मसरत आलम शामिल हैं, को लगातार जेल में रखे जाने पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि इन लोगों ने जेल में कई साल बिताए हैं और अक्सर उन्हें उनके घरों और परिवारों से बहुत दूर की जेलों में रखा गया है.
उन्होंने कहा, “हमने बार-बार उनकी रिहाई, उनके मामलों की समीक्षा और बुजुर्ग व बीमार कैदियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है. मैं आज फिर से वही अपील दोहराता हूं.” उन्होंने आगे कहा, “शांति की तलाश से न्याय और करुणा को अलग नहीं किया जा सकता.” मीरवाइज ने रिपोर्ट में उठाई गई उन चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाया, जिनमें राजनीतिक और नागरिक गतिविधियों पर पाबंदियां, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए सिकुड़ती जगह, स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर रोक और लोगों के बीच बढ़ते अलगाव की भावना का जिक्र है.
अगर हालात में सुधार हुआ तो यह पाबंदियां क्यों?
उन्होंने कहा कि अगर हालात में सुधार हुआ है, तो यह पाबंदियों को कम करने, हिरासत के मामलों की समीक्षा करने, नागरिक स्वतंत्रता बहाल करने और एक ऐसा माहौल बनाने का मौका होना चाहिए, जहां लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राय और शिकायतें रख सकें.
मीरवाइज ने कहा, “शांति को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि कहीं विरोध-प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं.” उन्होंने बताया कि रिपोर्ट में राज्य का दर्जा बहाल करने, चुनी हुई सरकार को सार्थक शक्तियां देने, कड़े आतंकवाद-विरोधी कानूनों की समीक्षा करने और भारत-पाकिस्तान के बीच फिर से बातचीत शुरू करने की मांग की गई है.
उन्होंने कहा, “ये महत्वपूर्ण सुझाव हैं जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.” उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर मुद्दे को केवल सुरक्षा के नजरिए से हल नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजनीतिक मुद्दों के लिए राजनीतिक बातचीत की जरूरत होती है, और पुरानी शिकायतों को दूर करने के लिए सुलह की दिशा में ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता होती है.
बातचीत करना ही आगे बढ़ने का सबसे जिम्मेदार तरीका
मीरवाइज ने कहा कि हालांकि सरकारों की अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताएं और जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन लोगों की चिंताएं और आकांक्षाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. शांति की दिशा में होने वाली किसी भी सार्थक प्रक्रिया में इन्हें भी जगह मिलनी चाहिए.
पिछले साल की घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन घटनाओं ने एक बार फिर दिखा दिया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव कितना खतरनाक हो सकता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि टकराव के बजाय बातचीत करना ही आगे बढ़ने का सबसे जिम्मेदार तरीका है.
उन्होंने कहा, “मैं ये मुद्दे टकराव की भावना से नहीं, बल्कि अपने लोगों के भविष्य को लेकर सच्ची चिंता के कारण उठा रहा हूं. अगर सुरक्षा को बेहतर बनाने की दिशा में सार्थक प्रगति हुई है, तो अगला कदम सुलह-सफाई, राजनीतिक कैदियों की रिहाई और उनके मामलों की समीक्षा, नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली और ईमानदार राजनीतिक बातचीत के जरिए इसे आगे बढ़ाना होना चाहिए.
“शांति का असली पैमाना सिर्फ यह नहीं है कि हिंसा में कितनी कमी आई है, बल्कि यह है कि कितना भरोसा बहाल हुआ है. हमें इस रिपोर्ट से यही संदेश लेना चाहिए.”
