कहा जाता है कि Politics is game of Perception. राजनीति धारणा का खेल है. आजादी के बाद से हमारे नेता इस खेल को बखूबी खेलते आए हैं. इस खेल के दम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते और उतरते आए हैं. आम वोटर के बीच सियासी धारणा बनाने के कई तरीके होते हैं. कभी नारों या विरोध प्रदर्शन के बहाने कोई खास परसेप्शन बनाने की कोशिश की जाती है. कभी कोई ऐसा फॉर्मूला या सूत्र गढ़ा जाता है जिसके जरिए जनता के दिमाग में कोई बात विशेष बिठाने की कोशिश की जाती है.
उत्तर प्रदेश में लगभग 3 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी परसेप्शन या धारणा बनाने का ट्रेंड जोरों पर है. यहां की चुनावी जमीन पर अलग-अलग नेता और पार्टियां अपने-अपने फॉर्मूला के जरिए जनता को साधने की कोशिश कर रही हैं. इनमें सबसे पॉपुलर फॉर्मूला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का है. ये फॉर्मूला है 80-20.
80-20 वाला फॉर्मूला सीएम योगी या बीजेपी की राजनीति को काफी सूट करता है. इस फॉर्मूले में 80 से मतलब उत्तर प्रदेश की 80 फीसदी हिंदू आबादी से है और 20 फीसदी मुसलमानों की आबादी को पारिभाषित करता है. क्योंकि सीएम योगी की राजनीति का आधार उनका ब्रैंड हिंदुत्व है. यही वजह है कि इस फॉर्मूला की बदौलत वो ध्रुवीकरण का दांव आजमाते हैं. दरअसल सीएम योगी आदित्यनाथ का ये फॉर्मूला उनके या बीजेपी के धार्मिक समीकरणों पर आधारित है.
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 80-20 वाले फॉर्मूला के जवाब में 95-5 का सूत्र दिया है. 95 फीसदी में वो अपने पीडीए प्रयोग की जाति या वर्ग को रखते हैं जिनमें पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक शामिल हैं. दूसरी तरफ 5 फीसदी को वर्चस्ववादियों के तौर पर पारिभाषित करते हैं. इस फॉर्मूला के पीछे यूपी की जातियों का जोड़ है जिसे अखिलेश यादव पीडीए का नाम देते हैं. इस जाति फॉर्मूला के सहारे ही अखिलेश यादव 2027 में सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
गौर करने वाली बात ये है कि यूपी की सियासी जमीन पर ताल ठोंकने उतरे एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी एक फॉर्मूला दिया है. ये फॉर्मूला है 99-1 का. ये फॉर्मूला अमीर-गरीब की आर्थिक असमानता पर आधारित है. 99 में वो आम जनता है जिनमें गरीब, शोषित और वंचित शामिल हैं. दूसरी तरफ 1 फीसदी में ओवैसी आर्थिक तौर पर सक्षम या दौलतमंद लोगों को रखते हैं.
वैसे देश की राजनीति में फॉर्मूलों के सहारे सत्ता पाने का प्रयोग नया नहीं है. बल्कि इमरजेंसी के बाद से देश में ऐसे फॉर्मूले गढ़ने की राजनीति तेज हुई. फॉर्मूलों वाली राजनीति के केंद्र में देश के आर्थिक, जातिगत और सामाजिक समीकरण रहे हैं. जैसे 1977 के वक्त डॉ. राम मनोहर लोहिया एक नारा देते थे जो उस वक्त काफी प्रचलित था. ये नारा था-‘पिछड़े पावें सौ में साठ’. इसका मतलब था कि 100 में 60 फीसदी पर पिछड़ों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. बाद में इसकी कोशिशें तेज भी हुईं. जब 1977 में यूपी के मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने ओबीसी के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की. हालांकि आज की तरह उस वक्त भी सवर्ण जातियों की तरफ से इसका विरोध हुआ. रामनरेश यादव के विरोध में एक नारा दिया गया, ‘राम नरेश वापस जाओ, लाठी लेकर भैंस चराओ’. बाद में मंडल-कमंडल की राजनीति का दौर भी आया.
भारत की राजनीति के बाद के वर्षों में देखें तो बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने भी 95-5 का फॉर्मूला दिया था. कांशीराम अपनी रैलियों में इस फॉर्मूला को पैन और उसके कैप या ढक्कन के सहारे समझाते थे. आशय ये था कि जिस तरह पैन के बड़े हिस्से पर छोटे से कैप का कब्जा होता है उसी तरह देश के 95 फीसदी संसाधनों पर 5 प्रतिशत वर्चस्ववादी कब्जा करके बैठे हैं.
भारत का राजनीतिक इतिहास ऐसे तमाम फॉर्मूला, सूत्र और प्रयोग से भरा हुआ है. क्योंकि यूपी में जाति-धर्म की राजनीति का शुरुआत से बोलबाला रहा है. 2027 का चुनाव भी उसी पिच पर जाता दिख रहा है. ऐसे में नेताओं या पार्टियों की तरफ से फॉर्मूला और सूत्रों के सियासी प्रयोग जमकर आजमाए जा रहे हैं.
