सुप्रीम कोर्ट ने देश में लोकसभा और विधानसभा की अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में रोटेशन लागू करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. इस दौरान चीफ जस्टिस (CJI) की ओर से की गई टिप्पणी सुर्खियों में है. CJI सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता के वकील से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ‘आपने गलत नंबर डायल कर दिया है, यह तो विरोध और प्रदर्शनों का दौर है. शायद आपको भी वही रास्ता अपनाना चाहिए.’
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है और वैसे भी उनका गला खराब है. इस पर CJI ने स्पष्ट किया कि संविधान में बदलाव करना या नया नियम लागू करना संसद का काम है, अदालत का नहीं.
क्या है पूरा मामला?
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने कोर्ट में एक अर्जी दायर की. उन्होंने इस बात को चुनौती दी है कि 1952 के पहले चुनाव से लेकर अब तक यह सीट लगातार अनुसूचित जाति (SC) के लिए ही आरक्षित क्यों है.
CJI सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए कहा, ‘एक बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे उम्मीदवार की जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दलों और उनकी नीतियों/विचारधारा के आधार पर वोट दें. वोट देते समय मुख्य बात पार्टी की नीति और विचारधारा होनी चाहिए, चुनाव में खड़ा व्यक्ति कौन है यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती.’
आरक्षित सीट होने से वोट का अधिकार नहीं छीनता: SC
कोर्ट ने कहा, ‘सीट आरक्षित होने से किसी नागरिक का वोट देने का अधिकार नहीं छीनता. मतदाता किसी भी समुदाय के प्रत्याशी को चुन सकता है. इसके अलावा, चुनाव लड़ने का इच्छुक व्यक्ति किसी भी अन्य गैर-आरक्षित सीट से मैदान में उतर सकता है.’
याचिकाकर्ता का कहना था कि इस व्यवस्था का फायदा केवल चार या पांच परिवारों तक ही सीमित रहा है. उन्होंने मांग की थी कि अधिकारियों को विधानसभा सीटों के आरक्षण में भी रोटेशन की व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया जाए जैसा कि पंचायत और नगरपालिका चुनावों में पहले से होता आ रहा है. उनका तर्क था कि रोटेशन व्यवस्था न होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के तहत मिलने वाले अधिकारों का हनन होता है और मतदाताओं के पास केवल अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के उम्मीदवारों को ही चुनने की मजबूरी के कारण उनके पास सही विकल्प नहीं बचते हैं.
इस पर कोर्ट ने कहा, ‘हम संविधान के प्रावधानों को दोबारा नहीं लिख सकते. कोर्ट संसद का तीसरा सदन बनने का काम नहीं कर सकती. जस्टिस बागची ने कहा, ‘यह मानना गलत है कि बहुसंख्यक समाज हमेशा जाति या समुदाय के नाम पर ही वोट देगा. अदालत जनता के राजनीतिक फैसले पर कोई नियम नहीं बना सकती, क्योंकि किसे चुनना है, यह तय करने का पूरा अधिकार सिर्फ और सिर्फ मतदाताओं का है. किसी सीट के आरक्षित होने से किसी भी नागरिक का वोट देने का अधिकार नहीं छिनता.’
अनिवार्य रोटेशन की मांग वाली याचिका खारिज
जस्टिस बागची ने कहा कि जनता का वोट देने का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित है और वे किसी भी समुदाय के उम्मीदवार को अपनी मर्जी से वोट दे सकते हैं, लेकिन ये कहना सही नहीं है कि अपने समाज का प्रत्याशी न होने से वोट देने का अधिकार खत्म हो गया है. उन्होंने कहा, ‘चुनाव लड़ने का हक किसी एक सीट तक सीमित नहीं है. कोई भी व्यक्ति दूसरी गैर-आरक्षित सीटों से भी चुनाव लड़ सकता है.’
कोर्ट ने आरक्षित सीटों पर रोटेशन प्रणाली लागू करने की याचिका में दखल देने से इनकार कर दिया. चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 332 एससी और एसटी के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रावधान जरूर देता है, लेकिन कौन सी सीटें आरक्षित होंगी, यह एक अलग प्रक्रिया है. कोर्ट ने कहा, ‘किसी खास सीट को चुनने के तरीके से असहमत होने मात्र से वह प्रक्रिया असंवैधानिक नहीं हो जाती. अदालत का काम सिर्फ यह देखना है कि क्या इसमें कोई स्पष्ट मनमानी हुई है.’
जस्टिस बागची ने जोर देकर कहा कि लंबे समय तक आरक्षण से समाज में जातिगत भेदभाव बढ़ता है या नहीं, इसका आकलन करना विधायिका (संसद/विधानसभा) का काम है.
