जिस फिल्म में सबसे बड़ा एजेंट गुप्ता बर्गर सेंटर के फ्रेंच फ्राइज खाते हुए एंट्री करता हो उसके इरादे पहले ही समझ आ जाते हैं. गुप्ता बर्गर सेंटर से इसलिए क्यूंकि बाइक पर भी फ्रेंच फ्राइज पैक नहीं है. इस फिल्म की धुरंधर की वजह से ट्रोलिंग हो रही थे, ये गलत था लेकिन ये फिल्म धुरंधर से पहले भी आती तो भी इतनी खराब लगती. ये फिल्म उसी घिसे पिटे फार्मूले पर चलती है जिसे अब दर्शक नकार चुके हैं .
कहानी
ये कहानी है अल्फा नाम के एक प्रोग्राम की. बॉबी देओल सीता नाम की लड़की को पाल पोस कर बड़ा करते हैं, और उसे अपने एक मिशन पर लगाते हैं. ये अल्फा कौन है? इसकी फैमिली कहां है? बॉबी को ये कैसे मिली? क्या ये मिशन पूरा होगा? अगर इस बारे मैं ज्यादा बताया गया तो फिल्म में एक तो वैसे ही देखने लायक कुछ नहीं है, फिर तो जिन्होंने टिकट ले ली वो भी नहीं जाएंगे.
कैसी है फिल्म
ये एक खराब फिल्म है, यहां वही चीज़ें दिखाई गई हैं जो देखकर दर्शक पक चुके हैं, कहानी में कुछ नयापन नहीं ,एक्शन बचकाना, बिना लॉजिक के सीन, एक तरफ पीक डिटेलिंग की बात हो रही है और यहां पीक में ऐसी चीजें की गई हैं. जिनपर हंसी आती है, एक सीन में बाप बेटी मिलते है, बेटी एक जगह डांस कर रही है और फिर जब वो बात करते हैं तो एक स्टेडियम में, भाई वहीं किसी कैफे में बैठ जाते. एक जगह एजेंट किसी दूसरे के घर से जा रहा होता है और फिर रुककर उसी को कहता है चल निकल. एक्शन सीन भी बिल्कुल नहीं जमते. आलिया भले अल्फा हैं लेकिन वो इस किरदार में नहीं जमती. फिल्म लॉजिक को भूल जाती है और एंड में फिर वही सब होता है जो लोग अब यशराज के स्पाई यूनिवर्स में नहीं देखना चाहते. बेकार के गाने आते हैं जो आपके गुस्से को और बढ़ाते हैं. इसके बाद अब या तो ये यूनीवर्स बंद हो जाए या फिर कुछ साल रुककर कुछ अच्छा बनाया जाए क्योंकि ये टाइगर पठान कबीर की भी बेइज्जती है.
एक्टिंग
आलिया कमाल की एक्ट्रेस हैं लेकिन यहां वो कुछ कमाल नहीं कर पाती. उनपर ये किरदार सूट नहीं किया. वो एक्शन में नहीं जमती, ऐसा लगता है वो ओवर एक्टिंग कर रही हैं. अजीब एक्सप्रेशन दे रही हैं, sharwari के लिए जिन लोगों ने कहा था वो आलिया से बेहतर लग रही हैं,गलत कहा था, वो भी उतनी ही खराब लग रही हैं. बॉबी देओल बढ़िया लगे हैं लेकिन हरियाणवी का भी उन्होंने बढ़िया बैंड बजाया है. उनको ये एक्सेंट नहीं देना चाहिए था, ये काफी इरिटेटिंग लगता है. अनिल कपूर अपने किरदार में ठीक लगे है.
राइटिंग और डायरेक्शन
उदय चोपड़ा की कहानी काफी कमजोर है, कहानी में कुछ नहीं है ऐसा जो दर्शक को बांध सके. शिव रवैल का डायरेक्शन कहानी से ज्यादा खराब है
कुल मिलाकर ये फिल्म निराश करती है.
रेटिंग – 1.5 स्टार्स
