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Explained: ट्रंप के कमजोर होने से भारत के लिए आसान होगा व्यापार समझौता? कौन सी अड़चनें बाकी


अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर कब्जा कर लिया है. इस राजनीतिक भूचाल के बाद भारत में एक सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या एक कमजोर ट्रंप भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे? क्या लंबे समय से अटका हुआ भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अब जल्दी और भारत के पक्ष में हो पाएगा? इसका सीधा जवाब थोड़ा उलझा हुआ है. चुनाव नतीजों ने समझौते के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है, लेकिन कानूनी तंत्र और ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों को नहीं.

एक तरफ भारत के पास मोल-भाव की जगह बढ़ी है, तो दूसरी तरफ ट्रंप के पास भारत को घेरने के लिए अभी भी कई औजार मौजूद हैं…

भारत और अमेरिका का समझौता अभी कहां खड़ा है?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की कहानी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है. फरवरी 2026 में दोनों देशों ने एक अंतरिम समझौते का ढांचा तैयार किया था. इसमें अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर लगने वाले 50% टैरिफ को घटाकर 18% करने का वादा किया था.

इसके बाद से कोई ठोस प्रोग्रेस नहीं हुई. अक्टूबर 2026 में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमीसन ग्रीर ने साफ कहा था कि समझौता दूर है, क्योंकि कुछ अहम मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है. यानी नौ महीने बीत जाने के बाद भी कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता सामने नहीं आया है.

ट्रंप कमजोर हुए, लेकिन टैरिफ की ताकत बाकी

यह मान लेना गलत होगा कि डेमोक्रेटिक कांग्रेस ट्रंप की टैरिफ नीतियों को तुरंत पलट देगी. अमेरिकी कानून के तहत, राष्ट्रपति के पास सेक्शन 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा) और सेक्शन 301 (अनुचित व्यापार प्रथाओं) के जरिए टैरिफ लगाने की व्यापक शक्तियां हैं.

कांग्रेस सुनवाई कर सकती है, दस्तावेज मांग सकती है या टैरिफ सीमित करने के लिए विधेयक पारित कर सकती है, लेकिन ट्रंप के पास वीटो है. इसे पलटने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो फिलहाल संभव नहीं दिखता. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का भी मानना है कि ट्रंप अपनी टैरिफ रणनीति नहीं बदलेंगे, क्योंकि वे सेक्शन 232, 301 और कार्यकारी आदेशों पर निर्भर रहेंगे.

भारत के लिए दोहरा समीकरण: ज्यादा जगह, लेकिन नई चुनौती भी

  • फायदे का पहलू: ट्रंप राजनीतिक रूप से कमजोर हुए हैं और यह भारत के लिए एक बड़ी राहत है. पहले उनके पास प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति पद का समर्थन था. अब सिर्फ राष्ट्रपति पद बचा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत जैसे देशों पर उनकी बात मानने का दबाव कम होगा और उन्हें ‘ना’ कहने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. ट्रेड एक्सपर्ट बिस्वजीत धर का कहना है, ‘ट्रंप अब प्रभुत्व की स्थिति से शर्तें नहीं थोप पाएंगे.’
  • नुकसान का पहलू: हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स इसके उलट भी चेतावनी दे रहे हैं. GTRI के अजय श्रीवास्तव का तर्क है कि रूस, चीन और ईरान के मामलों में विदेश नीति में नाकाम रहे ट्रंप को अब एक तेज जीत की जरूरत है. वे भारत पर समझौता जल्दी करने का दबाव बढ़ा सकते हैं ताकि अमेरिकी ताकत का प्रदर्शन हो सके. समझौता तेज हो सकता है, लेकिन जब तक यह साइन नहीं होता, भारत पर टैरिफ बढ़ भी सकता है.

कांग्रेस की भूमिका: निगरानी बढ़ेगी, लेकिन सीमाएं भी

डेमोक्रेटिक कांग्रेस ट्रंप के टैरिफ फैसलों की कांग्रेसनल निगरानी बढ़ा सकती है. इससे अमेरिकी वार्ताकारों की मांगें ज्यादा व्यावहारिक हो सकती हैं और भारत को एकतरफा शर्तें थोपने की गुंजाइश कम हो सकती है.

यहां एक अहम पेच है कि व्यापार नीति में द्विदलीय समर्थन (bipartisan support) बना हुआ है. डेमोक्रेट्स भी घरेलू उद्योगों और यूनियन श्रमिकों की रक्षा के लिए संरक्षणवादी रुख रखते हैं, इसलिए टैरिफ में बड़ी कटौती की उम्मीद कम है.

भारत की रेड लाइन: कृषि और डेयरी पर कोई समझौता नहीं

भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि गेहूं, चावल, सोया, मक्का, चीनी और डेयरी उत्पाद समझौते के दायरे से बाहर रहेंगे. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में साफ कहा है, ‘किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा.’

ये क्षेत्र ‘जानबूझकर रिंग-फेंस’ किए गए हैं ताकि छोटे किसान और डेयरी क्षेत्र अमेरिकी सब्सिडी वाले आयात के सामने असुरक्षित न हों. यानी कृषि पर भारत का रुख साफ है और यही वजह है कि समझौता पूरी तरह से टैरिफ कटौती का खेल नहीं है.

अभी भी लटके हुए जोखिम

समझौते के रास्ते में कुछ बड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं. सबसे बड़ा जोखिम H-1B वीजा को लेकर है. ट्रंप प्रशासन ने इस प्रोग्राम को सीमित करने की कोशिश की है, जिसका सीधा असर भारतीय IT कंपनियों और पेशेवरों पर पड़ता है. डेमोक्रेटिक कांग्रेस इस मामले में ज्यादा निगरानी रख सकती है, लेकिन तत्काल राहत की उम्मीद कम है.

दूसरा जोखिम रूसी तेल से जुड़ा है. ट्रंप के पास ग्राहम अधिनियम के तहत भारत पर भारी टैरिफ लगाने की शक्ति है, अगर वे रूसी तेल की खरीद जारी रखते हैं.

तीसरा जोखिम यह है कि भले ही समझौता हो जाए, ट्रंप के पास अभी भी सेक्शन 232 के तहत फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार है. यानी समझौता होने का मतलब यह नहीं कि टैरिफ का खतरा पूरी तरह टल जाएगा.

राहत और अनिश्चितता के बीच भारत

ट्रंप की हार ने भारत के लिए मोल-भाव की जगह जरूर बढ़ाई है, लेकिन समझौते की गारंटी नहीं दी है. एक तरफ भारत अब पहले से मजबूत स्थिति में है और अपनी संवेदनशीलताओं को सुरक्षित रखते हुए समझौता कर सकता है.

दूसरी तरफ, ट्रंप के पास अभी भी अपनी शर्तें मनवाने के लिए कई रास्ते खुले हैं. वे जल्दी परिणाम दिखाने के दबाव में भारत पर टैरिफ बढ़ा भी सकते हैं. भारत के लिए असली चुनौती यह होगी कि वह इस बदले हुए राजनीतिक समीकरण का फायदा उठाए, लेकिन कृषि और डेयरी जैसी अपनी रेड लाइन पर डटा रहे. साथ ही H-1B वीजा और रूसी तेल से जुड़े जोखिमों को भी ध्यान में रखे. फिलहाल, समझौता नजदीक तो दिख रहा है, लेकिन उसकी शर्तें किसके पक्ष में झुकेंगी, यह अभी तय नहीं है.



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