दुनिया का एक ऐसा देश है जहां पर मुस्लिम आबादी 96 प्रतिशत है लेकिन वहां हिजाब पर ‘प्रतिबंध’ लगा दिया गया है. आपको यह जानकर हैरानी जरूर हुई होगी. आइए जानते हैं पूरा मामला क्या है और सरकार के इस फैसले के बाद लोगों की प्रतिक्रिया क्या है.
जिस देश ने हिजाब पर बैन लगाया है वो है अजरबैजान. यहां के सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म और ड्रेस कोड के नियमों में किए गए संशोधनों के बाद देश भर में भारी असंतोष और विरोध-प्रदर्शन की लहर दौड़ गई है. रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियमों के लागू होने के बाद हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश करने से रोक दिया गया है, वहीं महिला शिक्षकों को अपने सिर का स्कार्फ़ (हेडस्कार्फ़) हटाने या परिणाम भुगतने के निर्देश दिए गए हैं.
हालांकि अज़रबैजान सरकार ने हिजाब पर किसी सीधे या स्पष्ट प्रतिबंध की घोषणा नहीं की है, लेकिन नए प्रावधानों के तहत ऐसे परिधानों पर रोक लगाई गई है जिन्हें राज्य के धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाता है. इस कदम ने देश में धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकारों और बच्चों के शिक्षा के अधिकार को लेकर एक नई बहस और गहरी चिंताएं पैदा कर दी हैं.
कैबिनेट प्रस्ताव नंबर 309 और विवाद का केंद्र
यह पूरा विवाद 21 सितंबर को कैबिनेट ऑफ मिनिस्टर्स द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव संख्या 309 के इर्द-गिर्द घूम रहा है. यह प्रस्ताव स्कूलों में ऐसे अतिरिक्त कपड़ों या धार्मिक प्रतीकों पर रोक लगाता है जो निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म के मानकों का उल्लंघन करते हैं.
अज़रबैजानी प्रेस एजेंसी (APA) के अनुसार, विज्ञान और शिक्षा मंत्रालय का उद्देश्य सभी सामान्य शिक्षा संस्थानों में देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप एक समान ड्रेस कोड लागू करना है. नए नियमों के तहत केवल विशेष सांस्कृतिक उत्सवों के दौरान ही पेडागोगिकल काउंसिल की मंज़ूरी से पारंपरिक या ऐतिहासिक परिधान पहनने की अनुमति होगी. अधिकारियों का तर्क है कि इन बदलावों से शिक्षकों के पेशेवर मानकों में सुधार होगा और शैक्षणिक संस्थानों की सार्वजनिक प्रतिष्ठा बनी रहेगी.
हालांकि, स्वतंत्र मीडिया आउटलेट JAMnews की रिपोर्ट के मुताबिक, इन संशोधनों में ड्रेस कोड का उल्लंघन करने पर कक्षाओं से निलंबित करने जैसी किसी स्पष्ट सज़ा का उल्लेख नहीं है. इसके बावजूद, 9 अक्टूबर को बाकू शहर के शिक्षा विभाग द्वारा निरीक्षण अभियान शुरू किए जाने के बाद जमीनी स्तर पर कठोर कार्रवाइयां देखने को मिलीं.
जन-आक्रोश और मानवाधिकारों पर सवाल
अजरबैजान की लगभग 96 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है (जिसमें शिया बहुसंख्यक और सुन्नी अल्पसंख्यक शामिल हैं). इसके बावजूद, देश का संविधान अजरबैजान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है.
सरकार जहां स्कूलों की धर्मनिरपेक्षता का हवाला दे रही है, वहीं नागरिक समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि हेडस्कार्फ़ पहनना एक व्यक्तिगत और धार्मिक अधिकार है, जिससे बच्चे की शिक्षा बाधित नहीं होनी चाहिए.
अल जज़ीरा से बातचीत में शिक्षिका ज़हरा हसनोवा ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “मुझे बताया गया कि अब मैं स्कूल में हिजाब नहीं पहन सकती. यह मेरी व्यक्तिगत पसंद है, और अगर मैं इसे उतारना भी चाहूं, तो वह फैसला भी मेरा ही होना चाहिए.”
अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मंचों पर भी इस कदम की आलोचना हो रही है. ‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते’ (ICCPR) के अनुच्छेद 18 और ‘बाल अधिकारों पर कन्वेंशन’ के आर्टिकल 5 और 14 स्पष्ट रूप से माता-पिता को अपने बच्चों की धार्मिक व नैतिक परवरिश का अधिकार देते हैं. आलोचकों का सवाल है कि हेडस्कार्फ़ पहनने से कक्षा की पढ़ाई में किस तरह की रुकावट आती है.
क्लासरूम का बहिष्कार और व्यापक विरोध शुरू
पाबंदियों के लागू होते ही बाकू सहित देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन, कक्षाओं का बहिष्कार और ऑनलाइन अभियान शुरू हो गए हैं. बाकू के स्कूल नंबर 322 और 69 के छात्रों ने अपनी हिजाब पहनने वाली सहपाठियों के समर्थन में कक्षाओं में जाने से मना कर दिया और परिसर के बाहर विरोध जताया.
वहीं, जलीलबाद (स्कूल नंबर 9) में छात्राओं को हेडस्कार्फ़ के कारण स्कूल भवन में प्रवेश नहीं करने दिया गया. खोखमेली इलाका में उग्र माता-पिता ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी बेटियों को रोका गया, तो वे अपने बेटों को भी स्कूल भेजना बंद कर देंगे.
37 लोगों की गिरफ्तारी
12 अक्टूबर को अज़रबैजान के गृह मंत्रालय ने नियमों को लागू करने के दौरान हुई घटनाओं के संबंध में 37 लोगों की गिरफ्तारी की पुष्टि की. पुलिस ने हिरासत में लिए गए लोगों पर सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डालने, शिक्षण संस्थानों के कामकाज में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों के साथ टकराव भड़काने के आरोप लगाए हैं.
हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है कि सरकार ने गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम, उम्र या कथित रूप से क्षतिग्रस्त संपत्ति का कोई ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है. इससे यह आशंका जताई जा रही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और नाबालिग छात्रों को भी निशाना बनाया जा रहा है.
इसी बीच, 2020 से जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी नए नियमों के विरोध में जेल के भीतर से भूख हड़ताल की घोषणा की है. उनकी पत्नी द्वारा साझा किए गए संदेश में असलानोव ने इसे अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ संघर्ष का जरिया बताया.
विदेशी प्रभाव और भू-राजनीतिक कोण
इस आंतरिक विवाद के पीछे भू-राजनीतिक तनाव भी देखने को मिल रहा है. 2 अक्टूबर को ‘न्यू अज़रबैजान पार्टी’ के सम्मेलन में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने कहा कि देश को शिक्षा के माध्यम से “वैचारिक उकसावों” से बचाना होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अलीयेव का इशारा पड़ोसी देश ईरान के धार्मिक और वैचारिक प्रभाव की ओर था. सरकार समर्थक टिप्पणीकारों का आरोप है कि हिजाब पाबंदियों का विरोध करने वाले धार्मिक समूहों के संबंध विदेशी केंद्रों से हैं.
वहीं, पड़ोसी देश तुर्किए में भी इसका असर देखा गया. 3 अक्टूबर को इस्तांबुल स्थित अज़रबैजानी दूतावास के बाहर प्रदर्शन हुए, जिसने तुर्की के 1997 के ‘पोस्ट-मॉडर्न तख्तापलट’ की यादें ताजा कर दीं. हालांकि, तुर्किए की सत्तारूढ़ पार्टी (AKP) के प्रवक्ता ओमर सेलिक ने स्पष्ट किया कि इन प्रदर्शनकारियों का तुर्की सरकार से कोई संबंध नहीं है.
वर्तमान में अज़रबैजान के भीतर राय पूरी तरह बंटी हुई है. जहां एक वर्ग इसे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की रक्षा के लिए ज़रूरी मानता है, वहीं एक बड़ा वर्ग इसे मौलिक मानवाधिकारों और शिक्षा के अधिकार पर सीधा हमला करार दे रहा है.
