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FCRA बिल पर दो धड़े में बंटी कांग्रेस-सपा, कहां रह गया कन्फ्यूजन और क्या है प्रावधान?


लोकसभा में बुधवार को विभिन्न मुद्दों पर विपक्षी दलों के सदस्यों के हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही दो बार के स्थगन के बाद दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई. सदन ने शोर-शराबे के बीच ही खान एवं खनिजों से संबंधित एक बिल को पारित कर दिया और FCRA अमेंडमेंट बिल को JPC में भेजने का प्रस्ताव पास कर दिया. हालांकि इस पर विपक्ष का स्टैंड क्या था ये पूरी तरह से साफ नहीं हो पाया. लोकसभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने बिल पेश किया तो कांग्रेस के वेणुगोपाल ने कहा कि JPC की जरूरत नहीं है, बिल वापस लो. सपा चीफ अखिलेश यादव भी बोले कि बिल वापस लो, क्योंकि ये अल्पसंख्यकों के खिलाफ है.

ससंदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी सांसद से कहा कि आप एक प्वाइंट तो बता दीजिए कि इसमें क्या माइनॉरिटी के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि बड़ा अजीब विपक्ष है कि JPC की मांग करके खुद पलट रहा है. सरकार ने कहा, ‘FCRA पर कांग्रेस ने हद ही कर दी. कहां तो इसे JPC में भेजने को कह रही थी और आज जब भेज दिया तो कह रही है बिल ही वापस लो.’

FCRA कानून क्या है?

  • ये कानून विदेश से आने वाले पैसे या दान को नियंत्रित करता है.
  • इसका उद्देश्य है कि विदेशी पैसा भारत के खिलाफ इस्तेमाल न हो.
  • विदेशी पैसे का भारत की सुरक्षा-संप्रभुता के विरुद्ध उपयोग न हो.

मौजूदा FCRA कानून में NGO, चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी पैसा लेने के लिये FCRA रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती है. इसी कानून को धार देने के लिये सरकार FCRA संशोधन बिल लाई. सरकार का मकसद एकाउंटिबिलिटी फिक्स करना है कि विदेशी पैसा कहां से और कितना आ रहा है, किस काम में लगा रहा है और संस्था का रजिस्ट्रेशन खत्म होने की सूरत में उस पैसे से बनी संपत्तियों का क्या होगा. 

नए बिल में क्या प्रावधान

  • किसी संस्था या NGO का रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाता है तो उसकी संपत्ति पर सरकार के अधीन हो जाएंगी.
  • सरकार का नियंत्रण अस्थायी रहेगा. रजिस्ट्रेशन बहाल होते ही संपत्ति वापस संस्था के हवाले कर दी जाएंगी.
  • संस्था निर्धारित समय में रजिस्ट्रेशन बहाल नहीं करा पाती है तो संपत्तियां स्थायी रूप से सरकार की होंगी.
  • सुनिश्चित किया जाएगा कि विदेशी पैसा धर्मांतरण और देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल ना हो रहा हो.
  • राज्य की एजेंसियों को FCRA से जुड़े मामलों की जांच से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होगी.
  • संशोधित कानून में FCRA उल्लंघन पर अधिकतम सजा 5 साल से घटाकर अब सिर्फ 1 साल ही होगी.
  • उल्लंघन के आरोप या कार्रवाई पर जिला अदालत में अपील करने और चुनौती देने का अधिकार भी होगा.

इन्हीं संशोधनों का विपक्ष विरोध कर रहा है. उसे अंदेशा है कि सरकार FCRA को हथियार बनाकर मुस्लिम और ईसाई NGO के रजिस्ट्रेशन रद्द करेगी. उनके स्कूल-अस्पतालों और चैरिटेबल ट्रस्टों की संपत्तियों पर कब्जे करेगी. धर्मांतरण और देश विरोध के मामलों में फंसाकर अल्पसंख्यकों को टारगेट करेगी. लोकसभा में कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का यही पक्ष था कि बिल को JPC में भेजने की बजाए सरकार इसे वापस ही ले ले.

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने FCRA बिल को JPC के पास भेजे जाने पर कहा कि हमारा पक्ष ये है कि ये बिल वापस लेना चाहिए. टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि जब भी कोई संकट होता है तब यह सरकार कोई न कोई अमेंडमेंट करके प्रयास करता है कि अटेंशन कैसे हटाया जाए. हालांकि लेकिन सरकार खुली चुनौती दे रही है कि विपक्ष इस बिल में किसी धर्म के खिलाफ एक भी शब्द दिखा दे. बीजेपी ने पूछा कि कांग्रेस ये बिल रोककर आखिर किन्हें बचाना चाहती है?

FCRA बिल पर दो धड़े में बंटी कांग्रेस

सरकार ने कहा कि FCRA बिल को JPC में भेजना कांग्रेस की मांग थी. रिकॉर्ड बताता है कि FCRA संशोधन बिल को JPC में भेजने की मांग कांग्रेस ने ही की थी. 25 मार्च 2026 को लोकसभा में बिल पेश हुआ तो कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने मांग उठाई थी. मनीष तिवारी ने चर्चा में कहा था, ‘संशोधित बिल में गंभीर संवैधानिक समस्याएं हैं.’ 31 मार्च को फिर कहा था, ‘बिल दोषपूर्ण है, इसे JPC या सेलेक्ट कमेटी में भेजा जाए.’

ऐसे में सवाल है कि आज कांग्रेस लोकसभा में पलट क्यों गई? कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर दो धरों में बंटी हुई दिखाई दे रही है. लोकसभा में राहुल गांधी की गैरहाजिरी में केसी वेणुगोपाल बिल वापस लेने की मांग कर गये. जबकि राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का स्टैंड ये था कि बिल को JPC में भेजना ही चाहिये. 



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