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Xप्लेन: व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत का नाम क्यों? ट्रांसशिपमेंट विवाद का क्या असर पड़ेगा


अमेरिका ने भारत समेत दुनिया के कई देशों पर फिर एक गंभीर आरोप लगाया है. एक नई रिपोर्ट में ट्रंप सरकार ने आरोप लगाया गया है कि भारत उन 40 देशों में शामिल है जो एक गुप्त ट्रांस-शिपमेंट नेटवर्क के ज़रिए चीन को ट्रंप के टैरिफ़ से बचने में मदद कर रहे हैं. व्हाइट हाउस ने ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज़, स्कोप, एंड कॉस्ट्स नाम की एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट 25 पेजों में विस्तार से लिखा गया है कि चीनी एक्सपोर्टर अमेरिका के ऊंचे टैरिफ़ से बचने के लिए 40 से ज़्यादा देशों के ज़रिए सामान भेज रहे हैं.

पीटर नवारो के नेतृत्व में व्हाइट हाउस के ‘ऑफ़िस ऑफ़ ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी’ द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में चीन के ख़िलाफ़ लागू किए गए ‘सेक्शन 301’ टैरिफ़ ने अमेरिका को होने वाले सीधे चीनी एक्सपोर्ट को तो कम किया, लेकिन साथ ही इसने दुनिया भर में एक ट्रांस-शिपमेंट नेटवर्क को भी जन्म दिया.

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी उत्पादों को अमेरिका भेजने से पहले उन देशों में भेजा जाता है जहां अमेरिकी टैरिफ दरें कम हैं. वहां इन उत्पादों पर नए लेबल लगाए जाते हैं, उनकी पैकेजिंग बदली जाती है, नए इनवॉइस बनाए जाते हैं या उन पर थोड़ी-बहुत प्रोसेसिंग की जाती है, ताकि उन्हें किसी दूसरे देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जा सके.

रिपोर्ट में इस सिस्टम को “शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क” कहा गया है. इस समस्या के दायरे को समझाने के लिए रिपोर्ट में सालाना ट्रांसशिपमेंट या इससे जुड़े व्यापार के पांच अलग-अलग अनुमान दिए गए हैं जैसे गोल्डमैन सैक्स का $40 बिलियन, व्हाइट हाउस काउंसिल ऑफ़ इकोनॉमिक एडवाइजर्स का $60 बिलियन, एक्सिगर का $75 बिलियन, अमेरिकी वाणिज्य विभाग का $109 बिलियन और अल्टाना का $303 बिलियन. इसमें यह भी बताया गया है कि ये अनुमान अलग-अलग तरीकों पर आधारित हैं, इसलिए इनकी सीधे तुलना नहीं की जा सकती.

ट्रांसशिपमेंट क्या है?

ट्रांसशिपमेंट का मतलब है सामान को उसकी आखिरी मंज़िल तक पहुंचने से पहले किसी दूसरे देश से होकर ले जाना. कुछ मामलों में यह ग्लोबल ट्रेड का एक जायज़ हिस्सा है. हालांकि, व्हाइट हाउस का आरोप है कि कुछ चीनी कंपनियां भारत, वियतनाम, मैक्सिको, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों में अपने प्रोडक्ट या पार्ट्स भेजती हैं जहां उन पर बहुत कम प्रोसेसिंग होती है या उन्हें बस रीपैकेज किया जाता है. इसके बाद इन प्रोडक्ट्स को चीन के बजाय उन्हीं देशों से आए सामान के तौर पर अमेरिका में एक्सपोर्ट कर दिया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में लगभग 67 अरब डॉलर का चीनी सामान इसी तरह अमेरिकी बाज़ार में आया हो सकता है, जिससे चीनी इंपोर्ट पर अमेरिकी टैरिफ का असर कम हो गया.

भारत का ज़िक्र क्यों किया गया है?

‘मेक इन इंडिया’ और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी पहलों के तहत भारत मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक अहम जगह बन गया है. कई मल्टीनेशनल कंपनियों ने चीन से हटकर सप्लाई चेन को अलग-अलग जगहों पर फैलाने के लिए भारत में अपना प्रोडक्शन बढ़ाया है. व्हाइट हाउस की रिपोर्ट से पता चलता है कि कुछ चीनी प्रोडक्ट्स सीमित प्रोसेसिंग के बाद भारत के रास्ते अमेरिका पहुंच सकते हैं. हालांकि, इसमें ऐसी गतिविधियों में शामिल किसी खास भारतीय कंपनी, फैक्ट्री या शिपमेंट का नाम नहीं बताया गया है.

भारत पर इसका क्या असर हो सकता है?

इस पूरे रिपोर्ट में कहीं भी भारत पर सीधे  गलत काम करने का आरोप नहीं लगाया गया है, लेकिन इससे अमेरिका के बाज़ार में आने वाले भारतीय एक्सपोर्ट की ज़्यादा बारीकी से जांच हो सकती है. अमेरिकी कस्टम अधिकारी ‘रूल्स ऑफ़ ओरिजिन’ (यानी वे नियम जिनसे यह तय होता है कि कोई प्रोडक्ट असल में कहां बना है) की जांच को और सख्त कर सकते हैं. भारतीय एक्सपोर्टर्स को ऐसे और दस्तावेज़ देने पड़ सकते हैं जिनसे यह साबित हो सके कि प्रोडक्ट का काफ़ी हद तक निर्माण भारत में ही हुआ है. अगर जांच और सख्त होती है, तो इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर इक्विपमेंट, स्टील के सामान और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे सेक्टर को ज़्यादा नियमों का पालन करना पड़ सकता है.

क्या भारत पर कोई ठोस आरोप हैं?

अब तक, व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में शिपमेंट-लेवल के सबूत नहीं दिए गए हैं और न ही किसी ऐसे भारतीय एक्सपोर्टर का नाम लिया गया है जिस पर अमेरिकी व्यापार नियमों के उल्लंघन का आरोप हो. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) का तर्क है कि किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट्स होने का मतलब यह नहीं है कि वह चीनी एक्सपोर्ट ही है. आज की ग्लोबल सप्लाई चेन में कई देशों से पार्ट्स और रॉ मटीरियल आते हैं, जिससे इंटरनेशनल मैन्युफैक्चरिंग आपस में बहुत ज़्यादा जुड़ी हुई है. इसलिए, एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि चीनी इनपुट वाले सभी प्रोडक्ट्स को टैरिफ से बचने की कोशिश (टैरिफ इवेज़न) का उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए.

भारत को क्या करना चाहिए?

ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि भारत को अपने ‘रूल्स ऑफ़ ओरिजिन’ सर्टिफ़िकेशन, कस्टम्स वेरिफिकेशन सिस्टम और एक्सपोर्ट से जुड़े डॉक्यूमेंटेशन को मज़बूत करते रहना चाहिए. पारदर्शी सप्लाई चेन बनाए रखने और इंटरनेशनल ट्रेड नियमों का पालन करने से भारतीय एक्सपोर्टर्स को बेवजह के विवादों से बचने में मदद मिलेगी. साथ ही एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन के तौर पर देश की साख भी बनी रहेगीXप्लेन: व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में भारत का नाम क्यों? ट्रांसशिपमेंट विवाद का क्या असर पड़ेगा

क्या इससे भारत-अमेरिका के ट्रेड संबंधों पर असर पड़ सकता है?

ये आरोप ऐसे संवेदनशील समय में सामने आए हैं जब भारत और अमेरिका के बीच आपसी व्यापार बढ़ाने और मार्केट तक पहुंच बेहतर बनाने पर बातचीत चल रही है. हालांकि इस रिपोर्ट की वजह से रेगुलेटरी जांच-पड़ताल बढ़ सकती है, लेकिन जानकारों का मानना ​​है कि इससे दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी के पटरी से उतरने की संभावना कम है. भारत, अमेरिका के लिए एक अहम आर्थिक और जियोपॉलिटिकल पार्टनर बना हुआ है, खासकर तब जब वॉशिंगटन चीनी मैन्युफैक्चरिंग पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है.



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