‘ग्रहण योग’ का नाम सुनते ही मन में सवाल उठता है कि क्या आज चांद पर ग्रहण लगेगा? क्या सूतक मानना होगा और पूजा-पाठ रोकना पड़ेगा? 21 अक्टूबर 2026 को कोई सूर्य या चंद्र ग्रहण नहीं है.
चंद्रमा और राहु के एक राशि में होने को ज्योतिष में जिस ग्रहण योग से जोड़ा जाता है, उसका अर्थ आसमान में ग्रहण लगना नहीं है. खगोलविद फ्रेड एस्पेनक की ग्रहण सूची में भी आज किसी ग्रहण का उल्लेख नहीं है.
आज क्यों बन रही ग्रहण योग की बात?
21 अक्टूबर की निरयण ग्रह स्थिति में चंद्रमा और राहु कुंभ राशि में हैं. इसी राशि संबंध के आधार पर ज्योतिषीय भाषा में चंद्रमा-राहु की युति और ग्रहण योग की बात कही जा रही है. हालांकि, एक राशि में होना और दोनों का बिल्कुल समान अंश पर पहुंचना अलग स्थितियां हैं. इसलिए केवल राशि देखकर इसे ‘पूर्ण ग्रहण’ कहना गलत होगा.
ज्योतिषीय मान्यताओं में चंद्रमा को मन और भावनाओं से, जबकि राहु को भ्रम, असामान्य इच्छाओं और बेचैनी से जोड़कर देखा जाता है. इसीलिए इस युति की व्याख्या भावनात्मक उलझन या जल्दबाजी की प्रवृत्ति के रूप में की जाती है.
लेकिन इससे हर व्यक्ति को तनाव होगा या कोई नुकसान तय है, ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है. ये पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्याएं हैं, वैज्ञानिक रूप से स्थापित प्रभाव नहीं.
चंद्र ग्रहण लगने के लिए क्या जरूरी है?
वास्तविक चंद्र ग्रहण तब होता है, जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाए और उसकी छाया चंद्रमा पर पड़े. यह स्थिति पूर्णिमा पर बन सकती है. इसके लिए चंद्रमा का अपनी कक्षा के उस बिंदु के पास होना भी जरूरी है, जहां उसकी कक्षा पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने वाले तल को काटती है. इन्हीं दोनों बिंदुओं को खगोल विज्ञान में चंद्र कक्षीय पात और ज्योतिष में राहु-केतु कहा जाता है.
यानी राहु कोई ऐसा भौतिक पिंड नहीं है, जो चंद्रमा के सामने आकर उसे ढक देता हो. चंद्र ग्रहण में चांद पर पड़ने वाली छाया पृथ्वी की होती है. सूर्य ग्रहण में चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है.
हर महीने चंद्रमा-राहु मिलते हैं, फिर ग्रहण क्यों नहीं लगता?
चंद्रमा लगभग हर महीने राशि चक्र का एक चक्कर लगाता है. इस दौरान वह राहु वाले क्षेत्र से भी गुजरता है. लेकिन ग्रहण के लिए केवल इतनी स्थिति पर्याप्त नहीं है. सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा का जरूरी संरेखण भी होना चाहिए.
चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा के तल से लगभग पांच डिग्री झुकी है. इस वजह से अधिकांश पूर्णिमा और अमावस्या पर तीनों पिंड ग्रहण बनाने वाली स्थिति में नहीं आते. यही कारण है कि हर महीने पूर्णिमा और अमावस्या होने के बावजूद हर महीने ग्रहण नहीं लगता.
क्या आज सूतक लगेगा या पूजा रोकनी होगी?
आज वास्तविक ग्रहण नहीं है, इसलिए चंद्रमा-राहु की युति के नाम पर ग्रहण का सूतक मानने का आधार नहीं बनता. नियमित पूजा-पाठ, भगवान को भोग लगाने या भोजन करने पर ग्रहण संबंधी रोक लगाने की जरूरत नहीं है.
इस मामले में सबसे जरूरी फर्क शब्दों का है. ‘ग्रहण योग’ ज्योतिषीय व्याख्या का नाम है, जबकि सूर्य या चंद्र ग्रहण एक निश्चित खगोलीय घटना है. दोनों को एक मान लेने से ऐसी पाबंदियों और आशंकाओं को जगह मिलती है, जिनका आज के वास्तविक आकाशीय घटनाक्रम से संबंध ही नहीं है.
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