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Explained: मैक्रों सरकार की 5 बड़ी गलतियां जिसकी वजह से आज ‘जल’ रहा फ्रांस, आगे क्या रास्ता?


फ्रांस में सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन, आगजनी और जन-आक्रोश का माहौल है. ट्रेड यूनियनों, हाई स्कूल व यूनिवर्सिटी के छात्रों, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों और आम नागरिकों ने इमैनुएल मैक्रों सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. पेरिस, ल्योन और मार्सिले जैसे प्रमुख शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें आ रही हैं.

सवाल यह उठता है कि आखिर फ्रांस की सड़कों पर यह गुस्सा अचानक क्यों फूटा और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की ऐसी कौन-सी नीतियां हैं, जिन्होंने देश को राजनीतिक व सामाजिक संकट में धकेल दिया है? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस पूरे विवाद के पीछे मैक्रों सरकार की 5 प्रमुख रणनीतिक और नीतिगत गलतियां ज़िम्मेदार हैं. आइए एक-एक कर उन्हें समझते हैं.

शिक्षा बजट में भारी कटौती और छात्रों की उपेक्षा

इस पूरे आंदोलन की चिंगारी फ्रांस के हाई स्कूलों और विश्वविद्यालयों से सुलगनी शुरू हुई. सरकार ने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के नाम पर शिक्षा और सार्वजनिक बजट में बड़ी कटौती के फैसले किए.

इसके चलते सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी हो गई, कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ गई और शैक्षणिक बुनियादी ढांचा बदहाल हो गया.

युवाओं और छात्रों को लगा कि सरकार उनके उज्ज्वल भविष्य के साथ समझौता कर रही है. जब छात्रों ने शांतिपूर्ण ढंग से क्लास बहिष्कार कर प्रदर्शन शुरू किया, तो सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया. देखते ही देखते यह छात्र आंदोलन पूरे देश में कर्मचारियों और यूनियनों के साथ जुड़कर व्यापक रूप धारण कर गया.

महंगाई और जीवन-यापन के खर्च पर नियंत्रण की नाकामी

फ्रांस में बीते कुछ समय से खाद्य पदार्थों, बिजली, गैस और ईंधन की दरों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. महंगाई दर में वृद्धि ने मध्य वर्ग और निम्न-आय वर्ग की कमर तोड़ दी है. आम नागरिकों के लिए घर का किराया देना और रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है.

फ्रांस के श्रमिक संगठनों का आरोप है कि सरकार की नीतियां केवल कॉर्पोरेट्स और बड़े पूंजीपतियों को कर में छूट देने और लाभ पहुंचाने के लिए हैं, जबकि महंगाई की सबसे बड़ी मार झेल रहे कामकाजी वर्ग को कोई ठोस राहत नहीं दी गई.

संवादहीनता और प्रशासनिक एकतरफा रवैया

इमैनुएल मैक्रों के दूसरे कार्यकाल में उन पर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि वे जन-भावनाओं और लोकतांत्रिक संवाद की उपेक्षा करते हैं. चाहे पेंशन सुधार का मुद्दा रहा हो या सार्वजनिक खर्चों में कटौती का नया बजट, मैक्रों सरकार ने विपक्षी दलों, यूनियनों और सिविल सोसाइटी से व्यापक चर्चा किए बिना संसद के विशेष अधिकारों का इस्तेमाल कर फैसले थोपने का प्रयास किया.

जब सरकार ने प्रदर्शनकारियों की शुरुआती चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, तो जनता के बीच यह संदेश गया कि सरकार केवल प्रशासनिक ताकत के बल पर नीतियां लागू करना चाहती है. इस संवादहीनता ने आम नागरिकों के असंतोष को गुस्से में बदल दिया.

खुफिया विफलता और कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण खोना

फ्रांस में जब प्रदर्शनों की शुरुआत हुई, तो सरकार उनके प्रसार और उग्रता का सही आकलन करने में पूरी तरह विफल रही. खुफिया एजेंसियों की विफलता के कारण पुलिस प्रशासन समय रहते स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं सका.

पेरिस सहित कई बड़े शहरों में जब शुरुआती रैलियों में अराजक तत्व शामिल हुए, तो पुलिस व्यवस्था कम पड़ गई. सरकारी इमारतों (जैसे लिमोज सिटी हॉल) में आगजनी, दुकानों में तोड़फोड़ और वाहनों में आग लगाए जाने की घटनाओं ने देश की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. खुद सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि सुरक्षा संबंधी आकलन में कमियां रह गईं.

कल्याणकारी राज्य के मॉडल पर चोट

फ्रांस की सामाजिक संरचना की सबसे बड़ी ताकत वहां का ‘वेलफेयर स्टेट’ (कल्याणकारी राज्य) मॉडल रहा है, जहां सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देती है.

मैक्रों सरकार द्वारा सार्वजनिक सेवाओं, स्वास्थ्य क्षेत्र और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बजट में की गई कटौती को जनता ने फ्रांस के इस ऐतिहासिक सामाजिक समझौते पर हमले के रूप में देखा.

यही कारण है कि इस बार सड़कों पर केवल छात्र या वामपंथी दल ही नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्यकर्मी, सरकारी कर्मचारी, किसान और सेवानिवृत्त नागरिक भी इस आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं.

आगे का रास्ता और मैक्रों सरकार के सामने चुनौती

इन प्रदर्शनों के कारण फ्रांस की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंच रहा है. पर्यटन उद्योग प्रभावित हो रहा है और शेयर बाज़ारों में अनिश्चितता का माहौल है.

मैक्रों सरकार के सामने अब दो ही रास्ते बचते हैं, या तो वे सुरक्षा बलों के ज़रिए बलपूर्वक प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश करें जिससे हिंसा और भड़क सकती है या फिर वे पीछे हटकर यूनियनों और छात्र संगठनों के साथ मेज पर बैठकर समझौता करें और अपने विवादित नीतिगत फैसलों पर पुनर्विचार करें. फ्रांस का यह संकट यह साबित करता है कि जनता की भागीदारी और संवाद के बिना लागू की गई कोई भी आर्थिक नीति अंततः बड़े सामाजिक असंतोष का कारण बनती है.



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