राजधानी दिल्ली के राजनीतिक और सामाजिक मानचित्र पर जंतर-मंतर का नाम पिछले तीन दशकों से विरोध, संघर्ष और जनाक्रोश का दूसरा पर्याय रहा है. जब भी देश के किसी कोने से कोई किसान, छात्र, कर्मचारी या आम नागरिक सरकार की किसी नीति के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना चाहता था, तो उसका पहला और सबसे भरोसेमंद ठिकाना यही क्षेत्र बनता था. संसद भवन से महज कुछ ही दूरी पर स्थित होने के कारण यहां किया जाने वाला प्रदर्शन सीधे सत्ता के गलियारों तक अपनी गूंज पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता था. हालांकि, समय के साथ बढ़ते यातायात दबाव और प्रशासनिक चुनौतियों के चलते इस ऐतिहासिक जगह को धरना-प्रदर्शनों की सूची से हटा दिया गया है. आइए जानें कि यह लोकतंत्र की आवाज कैसे बना.
संसद से चंद कदमों की दूरी और आंदोलन का गढ़
ऐतिहासिक जंतर-मंतर की सबसे बड़ी ताकत इसकी भौगोलिक स्थिति रही है, जो संसद भवन से डेढ़ किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है. लगभग पिछले 33 वर्षों से इस स्थान ने देश के कई सबसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की गवाहई दी है. चाहे भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ ऐतिहासिक जनसमूह हो या फिर न्याय की गुहार लगाती जनता, हर किसी ने इसी मंच को अपनी बात कहने का जरिया बनाया. दिल्ली पुलिस के स्थानीय थानों के पुराने आंकड़ों के मुताबिक, केवल कुछ ही वर्षों के भीतर यहां हजारों की संख्या में रैलियां, धरने और जुलूस आयोजित किए गए थे, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि यह जगह जनता और सरकार के बीच संवाद का एक जीवंत सेतु रही है.
बोट क्लब से शुरू हुआ था दिल्ली का विरोध का सफर
जंतर-मंतर से पहले राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का मुख्य और सबसे बड़ा केंद्र बोट क्लब हुआ करता था, जो संसद भवन और इंडिया गेट के बेहद करीब स्थित था. साल 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले एक ऐसा विशाल ऐतिहासिक आंदोलन हुआ, जिसने प्रशासन की रूपरेखा ही बदल दी. उस प्रदर्शन में देश भर से करीब पांच लाख किसान अपनी बैलगाड़ियों और पशुओं के साथ बोट क्लब पहुंच गए थे. लगभग एक सप्ताह तक चले उस अभूतपूर्व प्रदर्शन ने पूरी दिल्ली की व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था, जिसके बाद सरकार ने बोट क्लब पर इस तरह के बड़े आयोजनों और भीड़ के जमावड़े पर पाबंदी लगाने का कड़ा फैसला ले लिया था.
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साल 1993 में जंतर-मंतर को मिला आधिकारिक ठिकाना
बोट क्लब पर रोक लगने के बाद आंदोलनकारियों के लिए कोई नया और सुरक्षित ठिकाना तलाशने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमें लगभग पांच साल का लंबा समय लगा. आखिरकार वर्ष 1993 के आसपास जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए आधिकारिक और वैकल्पिक स्थल के रूप में स्वीकार कर लिया गया. राजनीतिक तनाव और सुरक्षा कारणों के चलते राजपथ यानी मौजूदा कर्तव्य पथ से प्रदर्शनों को दूर करने की जो रणनीति बनाई गई थी, उसके तहत जंतर-मंतर को एक सबसे सही और बीच का रास्ता माना गया. यह संसद के पास भी था और नियंत्रण में रहने योग्य भी, जिससे राजधानी में लोकतंत्र की आवाज को एक नया और व्यवस्थित मंच मिल गया.
अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड का गवाह बना मंच
साल 2011 में जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे ने जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया, तो जंतर-मंतर इस महाआंदोलन का मुख्य केंद्र बनकर उभरा. इस स्थान ने देश के कोने-कोने से आए लाखों समर्थकों के जोश को देखा और केंद्र सरकार पर एक मजबूत वैधानिक दबाव बनाया. इसके ठीक अगले साल, देश को झकझोर देने वाले निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड के बाद न्याय और महिला सुरक्षा की मांग को लेकर आम नागरिकों का सैलाब इसी जमीन पर उमड़ पड़ा था. उन दिनों यहां जुटने वाले लोग सिर्फ एक मुट्ठी भर भीड़ नहीं थे, बल्कि वे देश की अंतरात्मा की आवाज बन चुके थे, जिन्होंने सत्ता को झकझोर कर रख दिया था.

नर्मदा बचाओ और किसानों के अनोखे प्रदर्शन
जंतर-मंतर के पन्नों पर कई अन्य बड़े सामाजिक संघर्ष भी सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं. वर्ष 2013 में मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में हजारों लोग इसी जगह पर एकत्र हुए थे और अपनी जायज मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी. इसके अलावा, साल 2017 में दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु से आए किसानों ने सूखे से राहत के लिए 40 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की मांग को लेकर यहां अनोखा और लंबे समय तक चलने वाला प्रदर्शन किया था. इन तमाम राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों ने जंतर-मंतर को केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे भारत के वैचारिक असंतोष और जनहित की लड़ाई का सबसे बड़ा साझा राष्ट्रीय मंच बना दिया था.
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