दिल्ली में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बेघर और विस्थापित लोगों के वोट के अधिकार को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया. कोर्ट ने कहा कि वह आदेश पारित करेगा.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि हर चीज को कोर्ट पर नहीं थोपा जा सकता है. बेघर या दूसरे स्थान पर विस्थापित लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर होने से रोकने के तरीके पर चुनाव आयोग को खुद काम करना चाहिए. हालांकि, आयोग ने कहा कि इसके लिए पहले से व्यवस्था है.
घर नहीं तो वोटर लिस्ट से नाम कैसे बचेगा
याचिकाकर्ता इंदु प्रकाश सिंह ने अदालत से मांग की कि बेघर और विस्थापित लोगों के नाम SIR की प्रक्रिया में शामिल रखने या उनके नाम कटने से बचाने के लिए अधिकारियों को जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया जाए. याचिका में दावा किया गया कि दिल्ली में करीब 3 लाख लोग बेघर हैं. ऐसे में चुनाव आयोग की घर-घर जाकर मतदाताओं की जांच करने की व्यवस्था उनके लिए बड़ी परेशानी बन सकती है.
कोर्ट बोला- हर चीज अदालत के भरोसे क्यों?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि बेघर या दूसरे स्थान पर विस्थापित लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर होने से रोकने का तरीका चुनाव आयोग को खुद तैयार करना चाहिए. कोर्ट ने साफ कहा कि हर चीज अदालत के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती. कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सब कुछ अदालत पर नहीं थोपा जा सकता. कोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए कि ऐसे लोगों के लिए उचित व्यवस्था कैसे बनाई जाए.
कोर्ट ने पूछा- किसी का नाम कटा है तो बताइए
हाईकोर्ट ने याचिका में ठोस उदाहरण नहीं दिए जाने पर भी सवाल उठाया. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह आशंका जताना पर्याप्त नहीं है कि लोगों के नाम वोटर लिस्ट से छूट सकते हैं. कोर्ट ने पूछा कि ऐसे किसी खास व्यक्ति का उदाहरण क्यों नहीं दिया गया जिसका नाम इस प्रक्रिया में छूट गया हो. कोर्ट ने कहा कि याचिका में फिलहाल बातें धारणा और आशंका पर आधारित हैं.
चुनाव आयोग ने कहा- व्यवस्था पहले से मौजूद
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि आयोग बेघर और बिना पते वाले लोगों की समस्या से पूरी तरह अवगत है. ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक प्रोटोकॉल पहले से मौजूद है. याचिकाकर्ता के वकील ने आयोग के इस दावे का विरोध किया और कहा कि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है.
याचिका में कहा- घर-घर सर्वे बेघरों के लिए बड़ी बाधा
याचिका में कहा गया कि दिल्ली में चल रही SIR प्रक्रिया की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि बूथ लेवल अधिकारी मतदाता को उसके दर्ज पते पर जाकर खोज सकें. याचिकाकर्ता के मुताबिक जिन लोगों के पास घर नहीं है या जो सरकारी कार्रवाई और तोड़फोड़ के कारण अपने पुराने पते से विस्थापित हो गए हैं उनके सामने बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.
नाम वोटर लिस्ट से कटा तो आगे भी मुश्किल
याचिका में आशंका जताई गई है कि अगर ऐसे लोगों को उनके पते पर नहीं पाया गया तो उनके नाम मतदाता सूची से छूट सकते हैं. इससे उनके वोट देने के अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है. याचिका में यह भी दावा किया गया है कि आगे चलकर मतदाता सूची से नाम हटने के कारण इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है.
अब हाईकोर्ट के आदेश का इंतजार
फिलहाल हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है. अब अदालत के आदेश से साफ होगा कि SIR के दौरान बेघर और विस्थापित लोगों के मताधिकार की सुरक्षा को लेकर क्या दिशा-निर्देश दिए जाते हैं.
