विपक्षी सांसदों के साथ चुनाव आयोग की ओर बढ़ रहे राहुल गांधी को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष अडिग है.
मार्च रुक गया है, लेकिन विवाद जारी है. अब मुख्य सवाल यह है कि राहुल गांधी इस विरोध से मोदी सरकार पर कितना दबाव बना पाएंगे. क्या चुनाव आयोग को किसी प्रक्रिया पर फिर से विचार करना पड़ेगा, या विपक्ष को केवल औपचारिक जवाब मिलेगा और उसकी मांगें अधूरी रह जाएंगी.
राहुल गांधी, भाजपा और भारत की उपलब्ध कुंडलियों की पड़ताल से दोनों पक्षों के लिए अनुकूल और प्रतिकूल, दोनों प्रकार के संकेत मिलते हैं. राहुल गांधी के लिए अपने अभियान को आगे बढ़ाने की संभावना तो दिखती है, लेकिन 15 अक्टूबर तक उनकी मांगें मान लिए जाने का कोई मजबूत आधार नजर नहीं आता है.
राहुल गांधी की कुंडली: तेवर तीखे रहेंगे, पर क्या पूरी होगी मांग?
राहुल गांधी की जन्मकुंडली में राहु की महादशा, शनि की अंतर्दशा और राहु की प्रत्यंतर दशा चल रही है, जबकि उनकी वर्षकुंडली में भी इसी अवधि में राहु की मुद्दा दशा प्रभावी है. वर्षकुंडली के दशमेश मंगल स्वराशि मेष में तीसरे भाव में स्थित हैं, जो प्रयास और संघर्ष का भाव माना जाता है. साथ ही मुन्थेश बुध भी अपनी ही राशि में विराजमान हैं.
यह ग्रह स्थिति राहुल गांधी को विरोध को आगे बढ़ाने, अपनी बात मुखरता से रखने और मुद्दों को चर्चा में बनाए रखने में सहायता देती है. हालांकि राजनीतिक रूप से मांगें पूरी कराने के लिए केवल मजबूत मंगल पर्याप्त नहीं होता. ताजिक ज्योतिष के अनुसार उनके वर्ष लग्नेश शनि और दशमेश मंगल के बीच निर्धारित दीप्तांश सीमा में सीधा इत्तशाल योग नहीं बन रहा है.
इसलिए उनकी इस सक्रियता को मांगों की सीधी स्वीकृति का संकेत नहीं कहा जा सकता. इसके अतिरिक्त वर्षकुंडली के सातवें भाव में चंद्रमा और केतु की नजदीकी सहयोगी दलों के साथ तालमेल के मोर्चे पर उतार-चढ़ाव की ओर इशारा करती है.
इसका सीधा मतलब यह है कि राहुल गांधी अपने विरोध और रैलियों के जरिए जनता व मीडिया में माहौल तो गरमाए रख सकते हैं, लेकिन सरकार से अपनी मांगें तुरंत और सीधे तौर पर मनवा पाना उनके लिए मुमकिन नहीं होगा. ज्योतिष के अनुसार संघर्ष करने की ताकत होना एक बात है और उस संघर्ष को वास्तविक जीत में बदलना दूसरी बात.
राहुल गांधी की कुंडली में सत्ता और प्रशासन से जुड़े ग्रह संबंधों का ऐसा कोई योग नहीं बन रहा है जो सरकार को उनकी मांगें (जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा या चुनावी प्रक्रिया में बदलाव) मानने पर मजबूर कर सके.
भाजपा और सरकार: बारहवें भाव का योग बढ़ाएगा सिरदर्दी या मिलेगी राहत?
दूसरी ओर भाजपा की वर्षकुंडली में लग्नेश मंगल और दशमेश शनि का इत्तशाल योग बन रहा है, लेकिन दोनों ही ग्रह बारहवें भाव में बैठे हैं. ताजिक सिद्धांतों में ऐसा प्रतिकूल भाव-संबंध शुभ परिणामों में बाधा डालता है, इसलिए इसे भाजपा के लिए कोई आसान सफलता नहीं माना जा सकता.
पार्टी को आरोपों का जवाब देने, अपनी स्थिति स्पष्ट करने और विवाद संभालने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ सकती है. इसके बावजूद, भाजपा की वर्षकुंडली के ग्यारहवें भाव में स्थित राहु राजनीतिक संपर्कों और समर्थन का मजबूत आधार प्रदान करता है.
विपक्ष के बढ़ते दबाव से भाजपा की मुश्किलें बढ़ तो सकती हैं, लेकिन इससे पार्टी का समर्थन टूटने या मोदी सरकार की स्थिरता प्रभावित होने जैसी फिलहाल कोई स्थिति नही बनती दिख रही.
6 से 8 अक्टूबर: पुराने विवाद और वोटर लिस्ट पर तीखी रार
6 से 8 अक्टूबर के बीच 7 अक्टूबर को बुध और वक्री शुक्र की युति सटीक होगी, जो राहुल गांधी की लग्न राशि तुला में बन रही है. इस दौरान वे पुराने आरोप, दस्तावेज या वोटर लिस्ट से जुड़ी शिकायतें दोबारा उठा सकते हैं, जिसके जवाब में चुनाव आयोग और भाजपा की ओर से विस्तृत तथ्य सामने आ सकते हैं.
चूंकि बुध इस पूरी अवधि में मार्गी गति में है, इसलिए बुध के वक्री होने का तर्क यहां लागू नहीं होता. राहुल का मुख्य लाभ मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा में जीवित रखना होगा, लेकिन ठोस तथ्यों के आने पर उन्हें अपनी बात और स्पष्ट करनी पड़ सकती है.
9 अक्टूबर के बाद: भारत की वर्षकुंडली और सरकार के सामने चुनौतियां
9 अक्टूबर से भारत की वर्षकुंडली में गुरु की मुद्दा दशा शुरू हो रही है. यद्यपि गुरु अपनी उच्च राशि कर्क में हैं, लेकिन वे बारहवें भाव में स्थित हैं. इससे मोदी सरकार के सामने विवाद के समाधान के लिए अधिक प्रयास करने की स्थिति बनेगी. यानी राह सरकार के लिए आसान नहीं है.
चुनाव आयोग शिकायतों के निपटारे या प्रक्रियाओं पर अपनी बात विस्तार से रख सकता है. हालांकि इस दशा परिवर्तन से किसी निर्णय में फेरबदल तय नहीं होता और न ही इसे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे का संकेत माना जा सकता है.
10 से 12 अक्टूबर: टकराव के संकेत, क्या संभलेगी सियासी बयानबाजी?
10 से 12 अक्टूबर का समय विशेष रूप से संवेदनशील रह सकता है, क्योंकि 11 अक्टूबर को मंगल और वक्री शुक्र के बीच 90 डिग्री की दृष्टि बन रही है, जो टकराव का सूचक है. राहुल गांधी अपने तेवर और तीखे कर सकते हैं, जिससे प्रशासनिक या राजनीतिक स्तर पर नई बहस छिड़ सकती है.
इस अवधि में राहुल गांधी के लिए भी जोखिम है, क्योंकि कोई गलत बयान या सहयोगियों का अलग रुख अभियान से ध्यान भटका सकता है.
13 से 15 अक्टूबर: क्या हटेगा गतिरोध या केवल मिलेगा आश्वासन?
13 से 15 अक्टूबर के बीच, 15 अक्टूबर को सूर्य और गुरु के बीच 60 डिग्री की दृष्टि बनेगी, जो संवाद और समाधान के प्रयासों के लिए अनुकूल मानी जाती है. सरकार या चुनाव आयोग अपनी स्थिति विस्तार से रख सकते हैं और शिकायतों पर कार्रवाई का आश्वासन भी मिल सकता है, लेकिन केवल इस गोचर से मांगों के पूरी तरह मान लिए जाने की पुष्टि नहीं होती.
लब्बोलुआब यह है कि राहुल गांधी माहौल गरमा सकते हैं, सरकार की पेशानी पर बल ला सकते हैं, लेकिन इस दबाव को ठोस जीत में बदलना मुमकिन नहीं दिखता. ज्योतिषीय नजरिए से ताजिक और त्रिपताकी गणनाएं विपक्ष के पक्ष में एकतरफा झुकाव नहीं दिखातीं, इसलिए 15 अक्टूबर तक न तो ज्ञानेश कुमार की कुर्सी पर कोई आंच आती दिखती है और न ही सरकार के किसी फैसले से पीछे हटने के आसार हैं.
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