दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले कुछ दिनों से विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल का दौर जारी है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक नीट पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर 28 जून से लगातार अनशन पर बैठे हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े वांगचुक की भूख हड़ताल को आज 20 दिन हो चुके हैं, जिससे लगातार उनका स्वास्थ्य गिर रहा है. इस माहौल के बीच में देश की सियासत में मंत्रियों के इस्तीफे का एक पुराना और बेहद महत्वपूर्ण पन्ना पलट कर सामने आ गया है. आइए जानते हैं कि आजाद भारत के इतिहास में वह कौन सा पहला मौका था जब नेहरू सरकार के एक बड़े मंत्री ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.
स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में आए श्यामा प्रसाद मुखर्जी
आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू शुरुआत में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे. वैचारिक मतभेदों के बावजूद, महात्मा गांधी और देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के विशेष आग्रह पर नेहरू को अपनी जिद छोड़नी पड़ी. इन दोनों बड़े नेताओं की पैरवी के बाद डॉ. मुखर्जी को स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में जगह मिली और उनको देश का पहला उद्योग और आपूर्ति मंत्री बनाया गया. हालांकि सरकार के भीतर वैचारिक मतभेदों की यह नींव ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकी और जल्द ही एक बड़े विवाद का रूप ले बैठी.
नेहरू सरकार से पहला ऐतिहासिक इस्तीफा
मंत्रिमंडल में शामिल होने के कुछ ही वर्षों के भीतर देश की राजनीति में एक अभूतपूर्व मोड़ आया. साल 1950 में 19 अप्रैल के दिन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा दे दिया, जो कि देश के इतिहास में किसी भी केंद्रीय मंत्री का पहला इस्तीफा था. इस ऐतिहासिक कदम के पीछे की सबसे बड़ी वजह तत्कालीन भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ लियाकत-नेहरू समझौता था. डॉ. मुखर्जी का स्पष्ट तौर पर मानना था कि नेहरू सरकार की नीतियां पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों और सुरक्षा की पूरी तरह से अनदेखी कर रही हैं.
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विभाजन के बाद उभरा गहरा संकट
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम और विवाद को समझने के लिए साल 1949-50 के हालातों को देखना जरूरी है. 1947 में देश के बंटवारे के बाद भी दोनों ओर बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक आबादी रह रही थी. उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार की खबरें आने लगीं, जिससे लाखों की संख्या में शरणार्थी भागकर पश्चिम बंगाल आने लगे. इस गंभीर स्थिति के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का खतरा मंडराने लगा था. इसी भीषण मानवीय और राजनीतिक संकट को टालने के लिए दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच दिल्ली में एक द्विपक्षीय वार्ता का आयोजन किया गया था.
क्या नेहरू-लियाकत समझौता?
इस संकट के समाधान के रूप में दिल्ली में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के पीएम लियाकत अली खान के बीच एक समझौता हुआ, जिसे दिल्ली पैक्ट भी कहते हैं. इस समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने यहां के अल्पसंख्यकों को पूर्ण नागरिकता, सुरक्षा और मौलिक अधिकार की गारंटी दी. इसके साथ ही शरणार्थियों को अपनी छोड़ी हुई संपत्तियों को बेचने और वापस लौटने की छूट दी गई. समझौते में जबरन कराए गए धर्म परिवर्तन और शादियों को पूरी तरह से अवैध घोषित किया गया और दोनों देशों में प्रांतीय स्तर पर निगरानी के लिए अल्पसंख्यक आयोग बनाने का फैसला हुआ.
क्यों इस समझौते से खुश नहीं थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी?
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस समझौते को नेहरू सरकार की कमजोरी और हिंदुओं के साथ एक बड़ा धोखा माना. उनका दृढ़ विश्वास था कि पाकिस्तान एक इस्लामिक देश बन चुका है, जो कभी भी अपने वादों से मुकर जाएगा और वहां पर गैर-मुस्लिम कभी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे. सरकार की नीतियों को तुष्टिकरण बताते हुए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि या तो दोनों देशों के बीच अल्पसंख्यकों की पूरी अदला-बदली कर दी जाए, या फिर हिंदुओं को बसाने के लिए पाकिस्तान की जमीन का एक अतिरिक्त हिस्सा मांगा जाए. जब सरकार ने इन सुझावों को नहीं माना तो उन्होंने कैबिनेट छोड़ दी.
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