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पूर्व CM वसुंधरा राजे के बयान के निकाले जा रहे मायने, ‘दुश्मनी तो जमकर करो भाई लेकिन…’


राजस्थान विधानसभा के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित ‘अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम में बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का भाषण सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है. इस दौरान उन्होंने राजनीति में ‘दोस्ती और दुश्मनी’ की सीमाओं और राजनीतिक शिष्टाचार को लेकर बेबाक टिप्पणी की, जिसके अब कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वसुंधरा राजे ने राजनीतिक विरोधियों को लेकर एक बेहद गहरी बात कही. उनका यह बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. उन्होंने कहा, “दुश्मनी तो जमकर करो भाई, लेकिन थोड़ी सी खिड़की छोड़ दो, थोड़ी सी गुंजाइश छोड़ दो, ताकि हम सभी जब कभी एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं तो हमको शर्मिंदा न होना पड़े. इतनी गुंजाइश तो आप लोगों को रखने की जरूरत है.”

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दलीय राजनीति से ऊपर उठकर निभाई परंपरा

राजे ने राजनीति में दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर पुरानी परंपराओं को निभाने पर जोर दिया. उन्होंने अपना एक पुराना अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब कांग्रेस के पूर्व सांसद अबरार अहमद का निधन हुआ, तो वह उनके ऑफिस जाने लगी थीं. उस वक्त कई लोगों ने उन्हें दलीय राजनीति का हवाला देकर रोकने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया और अपनी जिम्मेदारी निभाई.

सिकंदर-पोरस और नरसिम्हा राव का दिया उदाहरण

विरोधियों के प्रति सम्मान की भावना को स्पष्ट करने के लिए वसुंधरा राजे ने इतिहास और भारतीय राजनीति के दो बड़े उदाहरण पेश किए सिकंदर और पोरस: राजे ने कहा कि सिकंदर महान ने युद्ध में राजा पोरस को हराने के बाद भी उनके साथ एक शासक जैसा ही सम्मानजनक व्यवहार किया था.

पूर्व कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की तारीफ करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि राव ने जिनेवा में भारत का मजबूत पक्ष रखने के लिए विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था, जो राजनीतिक शिष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल है.

सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज

वसुंधरा राजे के इस भावुक और कूटनीतिक भाषण ने राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. लोग उनके इन शब्दों के अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं. इशारों-इशारों में कही गई इन बातों को वर्तमान राजनीतिक हालात और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

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