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‘फीस बढ़ाने के लिए स्कूलों को नहीं है सरकारी मंजूरी की जरूरत’, दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


दिल्ली हाईकोर्ट ने निजी गैर-सहायता (Unaided) मान्यता प्राप्त स्कूलों की फीस में बढ़ोतरी को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई स्कूल नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले अपनी प्रस्तावित फीस बढाना चाहता है, तो उसे फीस बढ़ाने के लिए Directorate of Education (DoE) से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर कोई स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के बीच फीस बढ़ाना चाहता है, तो उसके लिए DoE की पूर्व मंजूरी जरूरी होगी. जस्टिस अनूप जयराम भंबानी ने अपने फैसले में कहा है कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम (DSE Act) की धारा 17(3) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों पर सिर्फ इतना दायित्व है कि वे नए शैक्षणिक सत्र के शुरू होने से पहले अपनी प्रस्तावित फीस का विवरण DoE के पास दाखिल करें.

‘फीस बढ़ाने के लिए किसी पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं’

फैसले के तहत अदालत ने कहा कि धारा 17(3) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूल को शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए किसी पूर्व अनुमति या स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है. उसकी केवल वैधानिक जिम्मेदारी यह है कि वह सत्र शुरू होने से पहले अपनी प्रस्तावित फीस का विवरण DoE को सौंप दे.

DPS वसंतकुंज समेत कई प्राइवेट स्कूलों ने दी थी याचिका

यह फैसला DPS वसंतकुंज समेत कई निजी स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं पर दिया गया है. जिसमे इन स्कूलों ने DoE द्वारा फीस वृद्धि प्रस्तावों को खारिज करने के फैसले को चुनौती दी थी. फैसले में हाईकोर्ट ने DoE की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों से अस्पष्टता के साथ कानून और न्यायिक आदेशों की अनदेखी करते हुए लगातार कार्रवाई करता रहा.

DoE के अधिकार सीमित- HC

अदालत ने कहा, ”DoE की भूमिका केवल नियामक (regulatory) है और उसका अधिकार सीमित है. विभाग केवल यह सुनिश्चित कर सकता है कि स्कूल शिक्षा के व्यवसायीकरण (Commercialisation), मुनाफाखोरी (Profiteering) या कैपिटेशन फीस (Capitation Fee) में शामिल न हों. कोर्ट ने कहा कि DoE स्कूलों के वित्तीय मामलों का माइक्रो मैनेजमेंट (micro-manage) नहीं कर सकता.

सरप्लस राशि होना मुनाफाखोरी नहीं माना जा सकता- HC

अदालत ने यह भी माना कि स्कूलों को विकास और विस्तार के लिए उचित अधिशेष (Reasonable Surplus) रखने का अधिकार है और केवल अधिशेष राशि होना अपने-आप में मुनाफाखोरी नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल के पास अधिक अधिशेष राशि होना मात्र इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह व्यवसायीकरण या मुनाफाखोरी कर रहा है. ऐसा निष्कर्ष सिर्फ विस्तृत वित्तीय ऑडिट के बाद ही निकाला जा सकता है.

‘मुनाफाखोरी के आरोप बिना किसी ठोस निष्कर्ष के लगाए’

हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में DoE ने स्कूलों पर मुनाफाखोरी के आरोप बिना किसी ठोस निष्कर्ष के लगाए. अदालत ने इन टिप्पणियों को “Gratuitous Rhetoric” बताते हुए कहा कि यह स्कूलों के ऑडिट की गलत समझ पर आधारित थीं. स्कूलों ने अपनी दलील में यह भी कहा था कि डेवलपमेंट फंड छात्रों से स्कूल के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए है और इसे सामान्य खर्चों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

हाईकोर्ट ने कहा कि लैंड क्लाउज (Land Clause) सिर्फ एक संविदात्मक (Contractual) शर्त है और यह DoE की वैधानिक शक्तियों में इजाफा नहीं कर सकती. अदालत ने कहा कि ऐसे नियम को भी DSE Act और नियमों के अनुरूप ही पढ़ा जाएगा.

हाईकोर्ट ने अभिभावकों को भी दी राहत

हालांकि हाईकोर्ट ने अभिभावकों को बड़ी राहत देते पुराने शैक्षणिक सत्रों की बकाया फीस वसूलने की अनुमति नहीं दी. हाईकोर्ट ने कहा कि कई प्रस्ताव 2016-17 से लंबित थे और अब अभिभावकों से पिछली अवधि की फीस वसूली करना अनुचित और अस्वीकार्य बोझ होगा. अदालत ने निर्देश दिया कि स्कूलों द्वारा प्रस्तावित अंतिम फीस वृद्धि अप्रैल 2027 से शुरू होने वाले अगले शैक्षणिक सत्र से लागू होगी. कोई भी स्कूल पिछली अवधि की फीस का बकाया नहीं वसूल सकेगा.

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