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Bengal Election: कैसे सोशल मीडिया बना बंगाल में ममता के हार की वजह, तकनीक कैसे तय कर रही नेताओं की किस्मत?


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  • भाजपा ने बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल की, रचा नया इतिहास।
  • सोशल मीडिया पर डिजिटल रणनीति का चुनाव में रहा अहम योगदान।
  • 3000 से अधिक इन्फ्लुएंसर्स ने फैलाया पार्टी का राजनीतिक संदेश।
  • युवा वोटरों से जुड़ाव और लगातार ऑनलाइन उपस्थिति रही प्रभावी।

Bengal Election: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में एक ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है. भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई है. ममता बनर्जी और टीएमसी के लगभग 15 सालों के वर्चस्व के बाद भाजपा उस राजनीतिक किले को भेदने में सफल रही जिसे कभी लगभग अभेद्य माना जाता था. जहां रैली, रोड शो और जमीनी स्तर के अभियानों ने अपनी भूमिका निभाई वहीं ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस बार असली रणभूमि सोशल मीडिया थी.

चुनाव के पीछे की डिजिटल जंग 

पारंपरिक चुनावी अभियानों के उलट जो सिर्फ रैली और जनसभा पर ही निर्भर होते थे इस चुनाव में जमीनी स्तर के प्रचार के पैरेलल एक डिजिटल रणनीति भी चलाई गई. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा की डिजिटल टीम चुनाव से लगभग 4 महीने पहले से ही पूरे राज्य भर में स्थित कई 4 स्टार और 5 स्टार होटलों में अपना काम कर रही थीं.

यहां से टीमों ने लगातार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट बनाए और पोस्ट किए. वीडियो, ग्राफिक्स और राजनीतिक संदेश के साथ-साथ कैंपेन मैटीरियल को इस तरह से तैयार किया गया था कि वे जनमत को प्रभावित कर सकें और ऑनलाइन अपनी उपस्थिति को बनाए रखें. 

भाजपा की डिजिटल रणनीति 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस डिजिटल अभियान का नेतृत्व अमित मालवीय ने किया था. अमित मालवीय भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख हैं. उनकी लीडरशिप में पार्टी ने एक ऑनलाइन नेटवर्क तैयार किया जिसका उद्देश्य बंगाल में राजनीतिक नैरेटिव को सीधे तौर पर आकार देना था.

सिर्फ पारंपरिक मीडिया कवरेज पर निर्भर रहने के बजाय भाजपा ने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने पर ध्यान लगाया.

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3000 इन्फ्लुएंसर्स का नेटवर्क 

इस अभियान का सबसे बड़ा पहलू पूरे राज्य में 3000 से ज्यादा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को शामिल करते हुए एक नेटवर्क बनाना था. इनमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर सक्रिय छोटे और बड़े दोनों तरह के कंटेंट क्रिएटर्स शामिल थे.

रिपोर्ट्स के मुताबिक इन्फ्लुएंसर्स के लिए कम से कम 5000 फॉलोअर्स होना जरूरी था. उनकी भूमिका राजनीतिक संदेशों को प्रसारित करना, चुनावी नैरेटिव को फैलाना और पूरे चुनावी मौसम के दौरान ऑनलाइन चर्चाओं को सक्रिय बनाए रखना था.

युवाओं तक पहुंच

भाजपा का सबसे बड़ा फायदा यह था कि वह युवा वोटरों और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से जुड़ने में कामयाब रही. इन्फ्लुएंसर्स के जरिए फैलाया गया कंटेंट ज्यादा तेजी से फैलता है. यह पारंपरिक राजनीतिक भाषणों के मुकाबले ज्यादा अपना सा लगता है. ऑनलाइन लगातार मौजूद रहकर पार्टी चर्चाओं पर हावी होने, नैरेटिव सेट करने और अपना संदेश बार-बार वोटरों तक पहुंचने में कामयाब होती है. आज की राजनीति में सोशल मीडिया पर किसी बात को बार-बार दोहराने और नजर आना अक्सर जमीनी प्रचार जितना ही जरूरी हो जाता है.

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