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Basti News: गाजी मियां गुरखेत मेले में प्रतिबंध के बावजूद निशान लेकर पहुंचे जायरीन, पुलिस ने लिया एक्शन


बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र के नगर पंचायत गायघाट स्थित सदियों पुराने ऐतिहासिक गाजी मियां गुरखेत मेले पर इस बार प्रशासनिक प्रतिबंध का पहरा भारी रहा. बहराइच के मुख्य मेले पर रोक के बाद शासन के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने इस आयोजन की अनुमति पहले ही निरस्त कर दी थी.

इसके बावजूद सोमवार को वर्षों पुरानी परंपरा निभाने के उद्देश्य से आसपास के करीब 40 गांवों से जायरीन हाथों में निशान (पारंपरिक ध्वज) लेकर मेला स्थल पर पहुंचने लगे और फातिहा की तैयारी करने लगे. प्रतिबंध के उल्लंघन की सूचना मिलते ही गायघाट चौकी इंचार्ज राकेश मिश्रा पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे.

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पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया विवाद

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए स्थानीय सभासदों और संभ्रांत नागरिकों की मदद ली. अधिकारियों ने लोगों को प्रशासनिक आदेश का हवाला देते हुए शांतिपूर्वक समझाया, जिसके बाद जायरीन बिना किसी टकराव के वापस लौट गए और मेला स्थल को खाली करा लिया गया. पुलिस की इस सूझबूझ से स्थिति पूरी तरह सामान्य रही.

गाजी मियां गुरखेत मेले में हर जुटती थी हजारों की भीड़

दरअसल, कलवारी थाना क्षेत्र के गायघाट कस्बे का गाजी मियां गुरखेत मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इस क्षेत्र का एक बड़ा सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र भी रहा है. हर साल यहां हजारों की भीड़ जुटती थी, जहां पूर्वांचल की प्रसिद्ध तरबूज और खरबूज की बड़ी मंडी सजती थी. 

इसके अलावा मेले में फातिहा पढ़ने, मन्नतें मांगने और झाड़-फूंक जैसी पारंपरिक रस्में निभाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है. इस बार प्रशासनिक कड़ाई के चलते यह पूरी रौनक गायब रही, जिससे स्थानीय व्यापारियों और श्रद्धालुओं में मायूसी देखी गई. इस मेले के बंद होने के पीछे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे सदियों पुराना एक ऐतिहासिक विवाद भी है. 

क्या था गाजी मियां का वास्तविक नाम

गाजी मियां को लेकर समाज में दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, इतिहासकारों के अनुसार, गाजी मियां का वास्तविक नाम सैयद सालार मसूद गाजी था. माना जाता है कि वह 11वीं सदी के कुख्यात विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी का भांजा था. सन् 1033 ईस्वी के आसपास वह अपनी सेना के साथ उत्तर भारत के बहराइच और आसपास के इलाकों पर अधिकार करने आया था.

बहराइच के मैदान में सालार मसूद गाजी का सामना स्थानीय राजाओं के संघ से हुआ, जिसका नेतृत्व पराक्रमी महाराजा सुहेलदेव कर रहे थे. इस भीषण युद्ध में सालार मसूद गाजी मारा गया. बाद में दिल्ली सल्तनत के शासकों द्वारा बहराइच में उसकी मजार (दरगाह) बनवाई गई, जो धीरे-धीरे एक बड़े पूजनीय स्थल के रूप में तब्दील हो गई. 

इनका मानना है कि सालार मसूद एक विदेशी हमलावर था, जिसने भारतीय संस्कृति और मंदिरों को नुकसान पहुंचाया. इसलिए, एक आक्रांता के नाम पर लगने वाले मेलों या उत्सवों को देश के आत्मसम्मान के खिलाफ माना जाता है. ये संगठन महाराजा सुहेलदेव को राष्ट्रनायक के रूप में स्थापित करने पर जोर देते हैं. 

इसके विपरीत, अवध और पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों के एक बड़ा मुस्लिम वर्ग गाजी मियां को एक चमत्कारी सूफी संत या पीर के रूप में पूजता है. लोग इन्हें मवेशियों का रक्षक मानते आए हैं और यह मेला उनके लिए सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रहा है.

मामले पर स्थानीय पुलिस ने क्या कहा?

स्थानीय पुलिस चौकी के दरोगा राकेश मिश्रा ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार कानून-व्यवस्था और सुरक्षा कारणों से इस बार मेले की अनुमति नहीं दी गई थी. इसकी सूचना ग्रामीणों को 15 दिन पहले ही दे दी गई थी. कुछ लोग अनजाने में निशान लेकर पहुंचे थे, जिन्हें स्थानीय संभ्रांत लोगों के सहयोग से समझा-बुझाकर शांतिपूर्ण ढंग से वापस भेज दिया गया है. क्षेत्र में पूरी तरह शांति व्यवस्था कायम है. 

प्रशासनिक कड़ाई के कारण भले ही इस बार गायघाट की जमीन पर पारंपरिक निशान नहीं लहराए, लेकिन इस प्रतिबंध ने इतिहास, राष्ट्रवाद और सदियों पुरानी लोक-आस्था के बीच छिड़ी बहस को इलाके में एक बार फिर से गरमा दिया है.

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