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Explained: बंगाल में OBC आरक्षण से मुस्लिम आउट! कैसे CM सुवेंदु ने 16 साल पुराना रिजर्वेशन घटाकर 7% किया, समझें पूरा खेल


पश्चिम बंगाल की राजनीति में OBC आरक्षण हमेशा से एक बड़ा और विवादित मुद्दा रहा है, लेकिन अब इसने एक ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के OBC आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस फैसले के तहत मुस्लिम समुदायों के लिए OBC आरक्षण पूरी तरह खत्म कर दिया गया है. सरकार ने 2010 से पहले वाली मूल OBC सूची को बहाल कर दिया है, जिसमें सिर्फ 66 जातियां शामिल हैं और इन्हीं जातियों को अब सिर्फ 7 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. यह फैसला नई सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के बाद लिया गया और इसके साथ ही राज्य में धर्म के आधार पर बनाई गई OBC श्रेणियों (OBC-A और OBC-B) को पूरी तरह खत्म कर दिया है. आखिर यह पूरा मामला है क्या?

2010 से पहले क्या थी व्यवस्था?

साल 2010 तक पश्चिम बंगाल की OBC सूची में केवल 66 जातियां शामिल थीं, जो पूरी तरह से सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर बनाई गई थीं. यह लिस्ट कई सालों की स्टडी और आयोग की सिफारिशों के बाद तैयार हुई थी और इसमें वास्तविक पिछड़े वर्ग के समुदायों को शामिल किया गया था.

2010 के बाद वाममोर्चा और तृणमूल ने कैसे बदले समीकरण?

इसके बाद शुरू हुआ सियासी खेल. सितंबर 2010 में वाममोर्चा सरकार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले OBC सूची में 42 नई जातियों को शामिल कर दिया और साथ ही आरक्षण को दो श्रेणियों में बांट दिया: श्रेणी-A (अति पिछड़ा) को 10% और श्रेणी-B (पिछड़ा) को 7% आरक्षण.

मई 2012 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इसे और आगे बढ़ाया और 35 और जातियां OBC सूची में जोड़ दीं. इन दोनों सरकारों ने मिलकर कुल 77 नई जातियां OBC सूची में शामिल कीं, जिनमें से 75 मुस्लिम समुदाय की थीं. इस तरह राज्य में OBC आरक्षण 17% (श्रेणी-A को 10% और श्रेणी-B को 7%) का हो गया और राज्य की लगभग 80% मुस्लिम आबादी इस आरक्षण के दायरे में आ गई.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस ‘खेल’ को कैसे पकड़ा?

22 मई 2024 को इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ आया, जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा की बेंच ने 2010 के बाद OBC सूची में शामिल की गई 77 जातियों के आरक्षण को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘इन समुदायों को OBC घोषित करने के लिए धर्म ही इकलौता मानदंड है.’ कोर्ट ने यह भी कहा कि यह आरक्षण राजनीतिक उद्देश्य के लिए दिया गया, जो लोकतंत्र और पूरे समुदाय का अपमान है. इतना ही नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन समुदायों को OBC का दर्जा दिया गया, वह जल्दबाजी में दिया गया क्योंकि यह ममता बनर्जी का चुनावी वादा था और सत्ता हासिल करते ही इसे पूरा करने के लिए असंवैधानिक तरीका अपनाया गया.

इस फैसले की वजह से 2010 के बाद जारी किए गए लगभग 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए. हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जो लोग पहले ही इस आरक्षण का फायदा उठाकर नौकरी पा चुके हैं, उनकी सेवाएं इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगी.

ममता बनर्जी का विरोध और कानूनी लड़ाई

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी ने बेहद सख्त रुख अपनाया. उन्होंने कहा, ‘मैं कोर्ट का यह आदेश नहीं मानूंगी, नहीं मानूंगी, नहीं मानूंगी…’ उनकी सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट में कानूनी उठापटक का दौर चला. पहले सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी और राज्य सरकार को 17% OBC कोटा लागू करने की अनुमति दे दी. लेकिन अगस्त 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस कौशिक चंदा ने एक JEE मामले में आदेश दिया कि 2010 वाला पुराना OBC कोटा फॉर्मूला (7%) ही लागू होगा. इसके बाद तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार को 17% कोटा लागू करने की अनुमति दे दी.

अब शुभेंदु सरकार ने क्या किया?

2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने सबसे पहला बड़ा फैसला OBC आरक्षण को लेकर लिया. सरकार ने 5 बड़े कदम उठाए:

  1. याचिका वापस ली: सबसे पहले, नई सरकार ने ममता बनर्जी सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दायर वह याचिका वापस ले ली, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी.
  2. पुरानी सूची बहाल: 19 मई 2026 को पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने अधिसूचना जारी कर 2010 से पहले की OBC सूची को बहाल कर दिया, जिसमें सिर्फ 66 जातियां शामिल हैं.
  3. आरक्षण घटाया: कुल OBC आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया गया.
  4. धर्म-आधारित श्रेणियां खत्म: OBC-A और OBC-B की धर्म-आधारित श्रेणियों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया.
  5. मुस्लिम समुदाय बाहर: नई सूची में 74 उप-जातियों को हटाया गया, जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम थीं. अब सिर्फ तीन मुस्लिम समुदाय- पहाड़िया, हज्जाम और चौदली ही OBC सूची में शामिल हैं.

इसके अलावा नई सूची में कपाली, कुर्मी, नाई (नेपित), तांती, धानुक, कसाई, खंडैत, तुरहा, पहाड़िया मुस्लिम, देवंगा, हज्जाम (मुस्लिम), गोआला, सुत्रधर, कर्मकार, स्वर्णकार आदि कई पारंपरिक और सामाजिक समुदाय शामिल हैं.

इस फैसले का कितना बड़ा है असर?

इस फैसले के 4 बड़े असर हो सकते हैं:

  • प्रभावित प्रमाणपत्र: हाईकोर्ट के फैसले के बाद 2010 के बाद जारी किए गए लगभग 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए.
  • लाभार्थी: पिछली व्यवस्था के तहत राज्य की लगभग 80% मुस्लिम आबादी को OBC आरक्षण का लाभ मिलता था, जो अब खत्म हो जाएगा.
  • शिक्षा पर असर: नई अधिसूचना के बाद शिक्षा विभाग ने केंद्रीकृत प्रवेश पोर्टल में OBC कोटा 7% कर दिया गया. प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार देबज्योति कोनार ने कहा, ‘हम प्रवेश और स्थापना के सभी मामलों में राज्य के आदेश का पालन कर रहे हैं.’
  • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस फैसले से राज्य में जातीय समीकरणों में बड़ा बदलाव आएगा. OBC रिसर्चर्स का कहना है कि हायर एजुकेशन, पुलिस बल और टीचिंग जैसी नौकरियों में मुस्लिमों की उपस्थिति में मामूली सुधार हुआ था, लेकिन अब उन्हें सामान्य श्रेणी में लड़ाई लड़नी होगी, जिससे उनका प्रतिनिधित्व तेजी से गिर सकता है.

इस पर सुवेंदु सरकार का कहना है कि यह फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट के मई 2024 के आदेश के अनुपालन में लिया गया है. सरकार का तर्क है कि पिछली सरकारों ने ‘वोट बैंक की राजनीति’ के लिए मुस्लिमों को OBC सूची में शामिल किया, जिससे वास्तविक पिछड़े हिंदू समुदायों को आरक्षण के लाभ से वंचित होना पड़ा.

वहीं, TMC ने इस फैसले को ‘मुस्लिम विरोधी’ और ‘सामाजिक न्याय के खिलाफ’ बताया है. बीजेपी ने इसे ‘तुष्टिकरण की राजनीति का अंत’ करार दिया है.

पूर्व शीर्ष सिविल सेवक और विशेषज्ञ जवाहर सरकार ने कहा कि बड़ी संख्या में मुस्लिमों के OBC सूची से बाहर होने का प्रभाव सामाजिक-आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक होने की संभावना है.

आरक्षण से ज्यादा बड़ा मुद्दा राजनीतिक

यह पूरा मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं, बल्कि राजनीति का है. 2010 में वाममोर्चा और 2012 में TMC ने चुनावी फायदे के लिए मुस्लिम समुदायों को OBC सूची में शामिल किया. 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया. 2026 में नई बीजेपी सरकार ने इसे अपना चुनावी वादा बनाया और सत्ता में आते ही लागू कर दिया.



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