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‘किसी मुसलमान ने विरोध…’, वंदे मातरम बिल पर सुन्नी उलेमा काउंसिल ने उठाए सवाल


‘वंदे मातरम’ के अपमान पर सजा का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक पर सुन्नी उलेमा काउंसिल और कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के पदाधिकारियों ने तल्ख टिप्पणी की. सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी सलीस ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया. वहीं, कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि कानून का सम्मान होना चाहिए, लेकिन किसी भी समुदाय पर किसी धार्मिक अभिव्यक्ति को अनिवार्य रूप से थोपना उचित नहीं होगा.

‘सरकार ऐसे मुद्दे उठा रही है, जिनसे समाज में धार्मिक तनाव पैदा हो’

सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी सलीस ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि सरकार लगातार ऐसे मुद्दे उठा रही है, जिनसे समाज में धार्मिक तनाव और नफरत का माहौल पैदा हो. देश की आजादी से लेकर आज तक किसी मुसलमान ने ‘वंदे मातरम’ गाने वालों का विरोध नहीं किया है. मुस्लिम समुदाय का इसे न पढ़ना किसी विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि उसकी धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है. इस्लाम में तौहीद यानी एक ईश्वर की उपासना का सिद्धांत है और मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करते हैं. कुछ पंक्तियों की धार्मिक व्याख्या के कारण मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग ‘वंदे मातरम’ का पाठ नहीं करते, लेकिन इसका अर्थ राष्ट्र का अपमान नहीं है.

उन्होंने सवाल उठाया कि जब ‘वंदे मातरम’ का अपमान होने की घटनाएं सामने ही नहीं आई हैं, तब इस विषय पर सजा का प्रावधान लाने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान हटाने के लिए इस प्रकार के मुद्दे उठा रही है. उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, महंगाई, सीमा सुरक्षा और अन्य जनहित के मुद्दों पर सरकार अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई है, इसलिए धार्मिक विषयों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाया जा रहा है. धर्म को लोगों की आस्था तक सीमित रहने देना चाहिए और उसे राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए.

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‘मुसलमान ‘जन गण मन’ जैसे राष्ट्रीय गीतों का करते हैं सम्मान’

वहीं, कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि किसी भी कानून का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि कानून सभी नागरिकों के लिए समान होता है. यदि किसी विशेष समुदाय को केंद्र में रखकर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि वह ‘वंदे मातरम’ नहीं पढ़ता, तो यह उचित नहीं है. मुसलमान ‘जन गण मन’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ जैसे राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों का सम्मान करते हैं. किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और किसी पर किसी विशेष गीत का पाठ अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि ‘वंदे मातरम’ की उन पंक्तियों पर विचार किया जाए, जिन्हें कुछ लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं मानते. यदि किसी प्रावधान से किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका हो, तो उस पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए. देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता देता है. इसलिए किसी भी कानून को लागू करते समय संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और सभी समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए. यदि इन पहलुओं पर संतुलित ढंग से विचार किया जाए तो कानून का स्वागत किया जा सकता है.

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