आकांक्षा मध्य प्रदेश के शाजापुर जैसे छोटे शहर से आती है और मध्यम वर्ग के परिवार में पहली बढ़ी है. पढ़ाई में अच्छी होने के कारण उनके माता-पिता भी उन्हें आगे पढ़ाने और यूपीएससी की तैयारी करने के लिए प्रोत्साहित करते थे. उसे समय छोटे शहर में करियर के ऑप्शन को लेकर जानकारी सीमित थी. एक बार और मीडिया में यूपीएससी सफल उम्मीदवारों की खबरें पढ़कर उनके मन में भी सिविल सर्विसेज में जाने का सपना बनने लगा.

उन्होंने ग्रेजुएशन की शुरुआत के साथ यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी. शुरुआत में उन्हें लगता था कि परीक्षा पास करने के लिए मेहनत ही काफी है, लेकिन तैयारी के दौरान उन्हें समझ आया मेहनत के साथ सही दिशा और सही रणनीति भी जरूरी है.

आकांक्षा ने सिविल सर्विसेज परीक्षा के तीन प्रयास किए. तीसरे प्रयास में वह प्रीलिम्स भी क्लियर नहीं कर पाई और उनका स्कोर कट ऑफ से सिर्फ 0.66 अंक कम रह गया. लगातार असफलताओं के बाद भी उन्होंने अपनी तैयारी छोड़ने के बजाय अपनी सोच बदलने का निर्णय लिया.

वहीं पहले वह यूपीएससी में सफलता को अपने लिए बहुत बड़ी और लगभग असंभव उपलब्धि मानती थी, लेकिन तीसरे प्रयास के बाद उन्होंने परिणाम की चिंता करने की बजाय अपनी पूरी क्षमता के साथ एक और साल तैयारी करने का निर्णय लिया. इसी बदलाव ने आगे की तैयारी में उनकी मदद की.

ग्रेजुएशन के बाद आकांक्षा को सीएपीएफ परीक्षा के बारे में जानकारी मिली. यूपीएससी सीएसई की तैयारी के दौरान उन्होंने पाया की सीएपीएफ और सिविल सर्विसेज के सिलेबस में काफी समानता है. इसी वजह से उन्होंने सीएपीएफ को अपने अगले टारगेट के तौर पर चुना.

उन्होंने सीडीएस जैसी परीक्षाएं भी दी थी, इससे उन्हें यूपीएससी के अलग-अलग परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सवालों और उनके पैटर्न की को समझने का एक्सपीरियंस मिला. वहीं सीएसई की तैयारी से मिले जनरल स्टडीज, इतिहास और राजनीति विज्ञान की मजबूत आधार का फायदा भी उन्हें सीएपीएफ की तैयारी में मिला.

आकांक्षा के दिनचर्या भी काफी अनुशासित थी. वह रोजाना सुबह करीब 6:30 से 7 बजे के बीच उठती और घर के जरूरी काम पूरे करने के बाद लगभग 9:00 बजे लाइब्रेरी पहुंचती. लाइब्रेरी में वह दिन का टारगेट करती थी और कम से कम 7 घंटे की प्रोडक्टिव पढ़ाई का टारगेट रखती थी. वह करीब रात 8 बजे तक लाइब्रेरी में पढ़ती. लंच और चाय के लिए समय निकालने के बाद घर लौटकर मौका मिलने पर सवालों की प्रैक्टिस भी करती थी.

सीएपीएफ लिखित परीक्षा क्लियर करने के बाद आकांक्षा के सामने फिजिकल टेस्ट की चुनौती थी. लिखित परीक्षा का रिजल्ट आने के बाद आकांक्षा ने फिजिकल की तैयारी शुरू की थी और उनके पास इसके लिए करीब 1 महीने का समय था.

फिजिकल टेस्ट के दिन 22 उम्मीदवारों में से सिर्फ 4 लड़कियां क्वालीफाई कर पाई. मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद आकांक्षा ने अपनी तैयारी पर भरोसा रखा और फिजिकल चरण को पार कर लिया. एक 800 मीटर दौड़ के दौरान भी उनकी दृढ़ता सामने आई, जब 22 में से 18 उम्मीदवार दौड़ से बाहर हो गए. तभी भी आकांक्षा ने दौड़ जारी रखी और इसे पूरा किया.

सीआरपीएफ में महिलाओं की भागीदारी कम होने की जानकारी ने भी आकांक्षा को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने सामाजिक अपेक्षाओं को अपने टारगेट के बीच नहीं आने दिया. उनका मानना है कि अगर वह इस क्षेत्र में सफल होती है तो उनकी उपलब्धि दूसरी लड़कियों और परिवारों को भी यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकती है कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती है.

आकांक्षा की प्रतिबद्धता उस समय भी दिखाई दी जब उनका सीडीएस इंटरव्यू और सीएपीएफ का फिजिकल एक दूसरे से टकरा रहा था. उन्होंने सीएपीएफ के फिजिकल असेसमेंट को प्राथमिकता दी. इस फैसले ने उनके चुने हुए टारगेट के प्रति उनके भरोसे को दिखाया.

वहीं कई असफलताओं, रणनीति में बदलाव और लगातार मेहनत के बाद आकांक्षा विश्वकर्मा ने यूपीएससी सीएपीएफ असिस्टेंट कमांडेंट एग्जामिनेशन 2025 में ऑल इंडिया रैंक तीन हासिल की. वह इस परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक हासिल करने वाली महिला बनी.
Published at : 18 Aug 2026 10:48 AM (IST)
