दिल्ली में इस साल H1N1 (स्वाइन फ्लू) के मामलों में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने शुक्रवार को दिल्ली के अधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की. राजधानी में H1N1 के 1,777 पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री पंकज कुमार सिंह ने बताया कि सभी सरकारी अस्पतालों को अलर्ट पर रखा गया है.
इसी बीच आम आदमी पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि बीमारी “चिंताजनक गति से फैल रही है” और यह “कोरोना की तरह एक व्यक्ति से पूरे परिवार तक पहुंच रही है”.
हालांकि वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार H1N1 का संक्रमण कोविड-19 पैदा करने वाले SARS-CoV-2 की तुलना में कम संक्रामक है. इसके लक्षण भी अधिकांश मामलों में हल्के होते हैं और पिछले डेढ़ दशक में संक्रमण तथा टीकाकरण के कारण लोगों में इसके खिलाफ कुछ हद तक प्रतिरक्षा विकसित हो चुकी है.
H1N1 वायरस की शुरुआत कैसे हुई?
H1N1 वायरस की पहली पहचान 2009 की शुरुआत में मैक्सिको में हुई थी. वैज्ञानिकों ने इसके जीनोम का अध्ययन कर पाया कि यह इंसानों, पक्षियों और सूअरों में वर्षों से फैल रहे विभिन्न इन्फ्लूएंज़ा वायरसों का मिश्रित रूप था. इसके आठ जीन खंडों में अधिकांश ऐसे थे जो पहले सूअरों में पाए जाने वाले वायरस से जुड़े थे. इसी वजह से इसे शुरुआती दौर में “स्वाइन फ्लू” कहा गया.
बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने स्पष्ट किया कि इस बीमारी का पोर्क खाने या सूअरों के संपर्क से कोई संबंध नहीं है. इसलिए इसे आधिकारिक रूप से Influenza A(H1N1) 2009 नाम दिया गया. 11 जून 2009 को WHO ने इसे महामारी घोषित किया और 10 अगस्त 2010 को महामारी समाप्त होने की घोषणा कर दी. इसके बाद यह वायरस मौसमी इन्फ्लूएंज़ा का हिस्सा बन गया और अब हर वर्ष H3N2 तथा इन्फ्लूएंज़ा B के साथ फैलता है.
2012 में द लैंसेट इंफेक्शियस डिज़ीज़ेज़ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, महामारी के पहले 12 महीनों में दुनिया भर में लगभग 2.84 लाख लोगों की मौत H1N1 से जुड़ी श्वसन और हृदय संबंधी जटिलताओं के कारण हुई थी.
H1N1 कितना तेजी से फैलता है?
किसी भी संक्रामक बीमारी के फैलाव को समझने के लिए वैज्ञानिक R₀ (आर-नॉट) का उपयोग करते हैं. इसका अर्थ है कि पूरी तरह संवेदनशील आबादी में एक संक्रमित व्यक्ति औसतन कितने लोगों को संक्रमित करता है.
2014 में BMC Infectious Diseases में प्रकाशित 57 अध्ययनों की समीक्षा के अनुसार, H1N1 महामारी का औसत R₀ लगभग 1.46 था. अधिकांश अध्ययनों में यह 1.3 से 1.7 के बीच पाया गया. वहीं सामान्य मौसमी फ्लू का R₀ लगभग 1.28 माना गया.
इसके विपरीत, कोविड-19 के शुरुआती SARS-CoV-2 वायरस का R₀ लगभग 2.5 था, जबकि बाद में आए ओमिक्रॉन वेरिएंट्स में यह कई गुना अधिक हो गया. इसका अर्थ है कि कोविड H1N1 की तुलना में कहीं अधिक तेजी से फैलने वाला वायरस था.
फिर भी H1N1 कई बार लोगों को अधिक तेजी से फैलता हुआ महसूस होता है. इसकी दो प्रमुख वजहें हैं.
पहली वजह है सीरियल इंटरवल. यानी एक संक्रमित व्यक्ति में लक्षण आने और उससे संक्रमित अगले व्यक्ति में लक्षण आने के बीच का समय. H1N1 में यह औसतन करीब तीन दिन होता है, जबकि शुरुआती कोविड-19 में लगभग 5.2 दिन था. कम सीरियल इंटरवल के कारण स्थानीय स्तर पर मामलों में अचानक वृद्धि दिखाई दे सकती है.
दूसरी वजह घरेलू संक्रमण है. H1N1 परिवारों, स्कूलों और बंद कमरों में तेजी से फैल सकता है, विशेषकर छोटे बच्चों के बीच. इसलिए यदि घर के एक सदस्य को संक्रमण हो जाए तो परिवार के अन्य सदस्यों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
संक्रमण कैसे फैलता है?
WHO और अमेरिकी CDC के अनुसार H1N1 मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बात करने के दौरान निकलने वाली श्वसन बूंदों (Respiratory Droplets) के माध्यम से फैलता है. ये बूंदें लगभग एक से दो मीटर की दूरी तक मौजूद व्यक्ति को संक्रमित कर सकती हैं. संक्रमित सतहों को छूने और फिर आंख, नाक या मुंह को छूने से भी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.
किन लोगों को सबसे अधिक खतरा है?
अधिकांश लोगों में H1N1 के लक्षण हल्के होते हैं और वे कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं. लेकिन कुछ समूहों में गंभीर बीमारी का खतरा अधिक रहता है. इनमें 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे, हृदय, फेफड़े, किडनी, लिवर या मधुमेह जैसी बीमारियों से पीड़ित लोग तथा कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले मरीज शामिल हैं.

यदि किसी व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई, सीने में दर्द, लगातार तेज बुखार, भ्रम की स्थिति, होंठों का नीला पड़ना या ठीक होने के बाद दोबारा तेज बुखार आने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
इलाज और बचाव
H1N1 के इलाज के लिए ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) सबसे प्रभावी एंटीवायरल दवा मानी जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार लक्षण शुरू होने के 48 घंटे के भीतर यह दवा शुरू करने पर सबसे अधिक लाभ मिलता है. भारत में ओसेल्टामिविर राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल है और सरकारी और बड़े निजी अस्पतालों में उपलब्ध रहती है.
बचाव के लिए बीमार व्यक्ति से दूरी बनाए रखना, खांसते या छींकते समय मुंह ढंकना, हाथों की नियमित सफाई करना, भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और जरूरत पड़ने पर वार्षिक फ्लू वैक्सीन लगवाना प्रभावी उपाय हैं.
अब पहले जैसी घातक क्यों नहीं रही बीमारी?
विशेषज्ञों का मानना है कि 2009 की महामारी के बाद दुनिया भर में बड़ी आबादी H1N1 वायरस के संपर्क में आ चुकी है. साथ ही मौसमी फ्लू के टीकों में अब H1N1 स्ट्रेन भी शामिल होता है. इससे लोगों में संक्रमण और गंभीर बीमारी का खतरा पहले की तुलना में कम हुआ है.
इसके अलावा चिकित्सा व्यवस्था में भी काफी सुधार हुआ है. समय पर ओसेल्टामिविर का उपयोग, बेहतर आईसीयू सुविधाएं, उन्नत वेंटिलेटर सपोर्ट और गंभीर मरीजों के बेहतर उपचार ने मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत की निगरानी प्रणाली अभी भी मुख्य रूप से अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर करती है. ऐसे में वास्तविक संक्रमण के आंकड़े रिपोर्ट किए गए मामलों से अधिक हो सकते हैं. इसलिए बढ़ते मामलों के बीच घबराने की बजाय सतर्क रहना, समय पर जांच कराना और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना सबसे प्रभावी उपाय है.
