सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल का बच्चों की मानसिक सेहत पर पड़ रहे असर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका पर अहम सुनवाई हुई. हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग पर विचार करे.
याचिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी और 13 से 16 साल के बच्चों के लिए सोशल मीडिया कंटेंट को नियंत्रित करने के साथ रात में इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की गई है.
नीति से जुड़ा मामला, केंद्र ने दिया भरोसा
चीफ जस्टिस के समक्ष केंद्र सरकार ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत नीति से जुड़ा मामला है. अगर याचिकाकर्ता अपनी मांगों को लेकर सरकार को औपचारिक प्रतिनिधित्व देते हैं तो उस पर कानून के मुताबिक विचार कर उचित फैसला लिया जाएगा. केंद्र के इस रुख के बाद अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र को याचिकाकर्ताओं की ओर से 20 अगस्त 2026 को दाखिल सुझावों वाले नोट के साथ प्रतिनिधित्व पर विचार करने का निर्देश दिया.
सोशल मीडिया कंपनियों से भी राय लेने की गुंजाइश
सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया कंपनी मेटा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने कहा कि जब केंद्र इस तरह के प्रतिनिधित्व पर विचार करता है तो आम तौर पर सभी संबंधित पक्षों की राय ली जाती है.इसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने वाले इंटरमीडियरी भी शामिल होते हैं.
अदालत ने भी केंद्र को जरूरत समझने पर याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधि को सुनवाई का मौका देने की छूट दी है.इसके बाद सरकार को इस पूरे मामले पर कारणों सहित आदेश पारित करना होगा.
13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कड़े नियम की मांग
याचिका में मांग की गई है कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच से बचाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कम उम्र के बच्चों तक ऐसा कंटेंट पहुंच रहा है, जो उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर असर डाल सकता है याचिका में अनुचित और शोषणकारी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाने के लिए भी ठोस व्यवस्था बनाने की मांग की गई है.
13 से 16 साल की उम्र के बच्चों के लिए ‘नाइट कर्फ्यू’
याचिका की सबसे अहम मांगों में 13 से 16 साल के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रात में इस्तेमाल की पाबंदी यानी ओवरनाइट कर्फ्यू लागू करने की मांग शामिल है. इसके तहत रात के समय बच्चों की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित करने के लिए नियम बनाने की मांग की गई है. याचिका में तर्क दिया गया है कि देर रात तक सोशल मीडिया का इस्तेमाल बच्चों की नींद, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है.
मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने सिर्फ नए दिशा-निर्देश बनाने की मांग नहीं की, बल्कि मौजूदा कानूनों को भी प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिया है. इसमें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 और पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई है.
बच्चों की प्राइवेसी पर भी नजर रखने की मांग
याचिका में सोशल मीडिया इंटरमीडियरी के कामकाज की निगरानी के लिए भी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है ताकि बच्चों के लिए बनाए गए प्राइवेसी नियमों का सही तरीके से पालन हो सके। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है. सरकार को याचिकाकर्ताओं के सुझावों और प्रतिनिधित्व पर विचार कर अपना कारणयुक्त फैसला देना होगा.
