अरावली पहाड़ियों की परिभाषा तय करने के लिए गठित ‘हाई-पावर्ड कमेटी’ को ज्यादा वक्त देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है. कमेटी ने 28 फरवरी 2027 तक का समय मांगा था. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए 30 नवंबर 2026 तक हर हाल में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है.
चीफ जस्टिस ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि कमेटी ने काम शुरू करते ही छह महीने का अतिरिक्त समय मांग लिया. ऐसा लगता है जैसे कमेटी उनके रिटायरमेंट का इंतजार कर रही हो. उन्होंने साफ किया कि कमेटी को किसी भी तरह का एक्सटेंशन नहीं मिलेगा. वह दिन-रात काम करे और तय समय सीमा में रिपोर्ट दे. इस मामले पर अगली सुनवाई 2 दिसंबर 2026 को होगी. CJI ने कहा, “अगर वे दो महीने में ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो हम पूरे पैनल का पुनर्गठन करेंगे.”
अरावली को लेकर क्या है विवाद?
पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट स्वीकार की थी. इसमें 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ी को अरावली की परिभाषा से बाहर किया गया था. पर्यावरणविदों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे छोटी पहाड़ियां और आसपास का ईको-सिस्टम संरक्षण से बाहर हो जाएगा और वहां अवैध खनन बढ़ जाएगा.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने मामले की समीक्षा के लिए इस साल मई में 5 सदस्यीय कमेटी बनाई. कमेटी को यह तय करना है कि पूरे अरावली क्षेत्र की सुरक्षा कैसे हो. उसे राजस्थान और गुजरात के आदिवासियों, किसानों और पर्यावरण विशेषज्ञों की बात सुनकर रिपोर्ट तैयार करनी है.
सियासी दलों ने विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट के बाद आंदोलन का ऐलान किया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए हाई-पावर्ड कमेटी को वक्त देने से इनकार कर दिया है.
