भारत की मेजबानी में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ‘नई दिल्ली डिक्लेरेशन’ को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया. इस घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों ने इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के स्थायी समाधान के लिए ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थन दोहराया. वहीं फिलिस्तीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक संस्थागत सहायता देने की मांग की गई है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत इजरायल की जिम्मेदारियों पर जोर दिया गया.
घोषणापत्र में कहा गया, ‘हम इस बात को दोहराते हैं कि इजरायल-फिलिस्तीन विवाद का एक न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान केवल शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है. यह हल फिलिस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों को पूरा करने पर निर्भर करता है, जिसमें उनके खुद का भविष्य तय करने का अधिकार और अपने घर लौटने का अधिकार शामिल है.’ ब्रिक्स देशों ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से फिलिस्तीन को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने और उनके संसाधनों तक बनाने में मदद करने की मांग की.
टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन
ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता दिए जाने के अपने समर्थन को दोहराया. ब्रिक्स ने इस रुख को टू-स्टेट सॉल्यूशन, अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद व महासभा के संबंधित प्रस्तावों और अरब पीस इनिशिएटिव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से जोड़ा. घोषणापत्र में मांग की गई कि 1967 की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर एक संप्रभु, स्वतंत्र और सक्षम फिलिस्तीन राज्य की स्थापना की जाए, जिसमें गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक शामिल हों और पूर्वी यरूशलेम उसकी राजधानी हो.
इसका मुख्य उद्देश्य शांति और सुरक्षा के साथ इजरायल और फिलिस्तीन, दोनों राज्यों को एक-दूसरे के बगल में अस्तित्व में लाना है. ब्रिक्स ने कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र से वहां के लोगों के किसी भी तरह के जबरन विस्थापन का कड़ा विरोध किया. डिक्लेरेशन में साफ कहा गया है कि किसी भी बहाने से फिलिस्तीनी लोगों को अस्थायी या स्थायी रूप से उनकी जमीन से हटाया जाना और गाजा पट्टी के भूगोल या आबादी के ढांचे में कोई भी बदलाव करना पूरी तरह से नामंजूर है.
गाजा की मानवीय स्थिति पर ब्रिक्स ने चिंता जताई
ब्रिक्स घोषणापत्र में गाजा की मानवीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के पालन की अपील की गई है. ब्रिक्स देशों ने गाजा में आम नागरिकों और बुनियादी ढांचे पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा की है. घोषणापत्र में युद्ध के हथियार के रूप में भूख का इस्तेमाल करने, अस्पतालों पर हमले करने और राहत सामग्री (राशन-दवाइयों) को रोकने जैसे कदमों का विरोध किया गया है.
इसके अलावा, मदद का राजनीतिकरण या सैनिकीकरण करने की कोशिशों का विरोध करते हुए फिलिस्तीनी शरणार्थियों की सेवा करने वाली संयुक्त राष्ट्र संस्था ‘UNRWA’ को अपना पूरा समर्थन दोहराया गया है और कहा गया है कि उसके काम में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए.
यरूशलेम की ऐतिहासिक और कानूनी पहचान को बदलने के किसी भी प्रयास को ब्रिक्स ने खारिज कर दिया. घोषणापत्र में शहर के सभी धार्मिक और पवित्र स्थलों की सुरक्षा और सभी धर्मों के लोगों को बिना किसी रुकावट के वहां जाकर अपनी धार्मिक पूजा-अर्चना करने के अधिकार पर जोर दिया गया. यह रुख भारत की अध्यक्षता में आयोजित 2026 के नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में नेताओं द्वारा अपनाए गए घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.
