ग्लोबल वार्मिंग और हिमालय की ग्लेशियल झीलों के गायब होने के खतरों के बीच, लद्दाख प्रशासन ने इतनी ऊंचाई और इतने मुश्किल हालात में एक खत्म हो रही झील को फिर से जीवित करने की अपनी तरह की पहली और इकलौती पहल शुरू की है. लद्दाख के चांगथांग ज़िले में 15,000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद “त्सो कार झील” (जो खत्म होने की कगार पर है) को फिर से जीवित करने का यह बड़ा प्रोजेक्ट है जिस में रेगिस्तानी इलाके से पानी को मोड़कर झील की तली को फिर से भरा जाएगा. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ, तो अक्टूबर 2027 तक यह झील पूरी तरह से पुनर्जीवित होकर अपने पुराने गौरव को वापस पा लेगी.
लद्दाख के LG वी.के. सक्सेना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि हमने लद्दाख में शानदार ग्लेशियल झील ‘त्सो कार’ को फिर से जीवित करने के लिए एक बहुत बड़ा काम शुरू किया है. इसमें ग्लेशियर के पानी को जोड़ने की नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे यह भारत में अपनी तरह का पहला हाई-एल्टीट्यूड इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट बन गया है.”
इतनी ऊंचाई और इतने मुश्किल हालात में किसी खत्म हो रही झील को फिर से जीवित करने की भारत में यह अपनी तरह की पहली और इकलौती कोशिश है. यहाँ गर्मियों में भी तापमान ज़्यादातर समय 10 डिग्री से कम रहता है और सर्दियों में यह माइनस 20 से 30 डिग्री तक गिर जाता है.
झील के आकार में कमी की वजह से प्रवासी पक्षी दूसरी जगह चले गए
15,000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद मशहूर त्सो कार झील कभी 11,000 एकड़ में फैली हुई थी, लेकिन पिछले दशक में यह 70% तक सिकुड़ गई है और अब इसका कुल क्षेत्रफल घटकर सिर्फ़ 3,200 एकड़ रह गया है.
‘त्सो कार’ में गिरने से पहले, ग्लेशियर का यह भारी मात्रा में पानी 3 प्राकृतिक गड्ढों (क्रमशः 270 एकड़, 24 एकड़ और 10 एकड़ में फैले) से होकर गुज़रेगा. ये गड्ढे मिलकर लगभग 1230 मिलियन लीटर पानी जमा करेंगे, जिससे तीन नए जलाशय (waterbodies) बनेंगे.
9 सितंबर से, लगभग 20 क्यूसेक पानी को पहले तालाब की ओर सफलतापूर्वक मोड़ा गया है. यह तालाब तेज़ी से भर रहा है और चार दिनों के भीतर ही झील में पिछले वॉल्यूम का 20% पानी भर चुका है.
अधिकारियों के अनुसार, जहां इन 3 जलाशयों/गड्ढों की कुल पानी जमा करने की क्षमता 1230 मिलियन लीटर है, वहीं इनसे ओवरफ़्लो होने वाला पानी अक्टूबर के पहले हफ़्ते तक मुख्य ‘त्सो कार’ झील तक पहुंचने की उम्मीद है.
सबसे अहम बात यह है कि इस कैस्केडिंग सिस्टम (पानी के एक के बाद एक जलाशय में गिरने की व्यवस्था) से दोहरे इकोलॉजिकल फ़ायदे होंगे. ‘त्सो कार’ तक पानी पहुँचने से पहले, तीन प्राकृतिक गड्ढों के भरने से तीन बिल्कुल नए, मीठे पानी वाले वेटलैंड (आर्द्रभूमि) बनेंगे. साथ ही, झील में सिर्फ़ साफ़ पानी पहुंचेगा क्योंकि सारी गाद (sediments) इन तीन नए जलाशयों में ही बैठ जाएगी. ये नए जलाशय, जो क्रमशः 270 एकड़, 24 एकड़ और 10 एकड़ के हैं, लगभग 1230 मिलियन लीटर पानी जमा करेंगे.
पास के लेह-मनाली हाईवे से दिखने वाले ये नए जलाशय पर्यटकों के लिए नए आकर्षण का केंद्र बनेंगे. साथ ही, ये प्रवासी पक्षियों के लिए बहुत ज़रूरी आवास भी बनेंगे, जिससे मुख्य झील को रिचार्ज करने के साथ-साथ इस इलाके की इकोलॉजिकल पहचान भी मज़बूत होगी. “स्टोक ग्लेशियर प्रोजेक्ट की सफलता ने साबित कर दिया है कि हमारे ठंडे रेगिस्तान में आसान इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर, टिकाऊ जल प्रबंधन पूरी तरह से संभव है. रूपशो खर्नक धारा का रुख बदलकर, हमारा मकसद त्सो कार झील में फिर से जान डालना है. यह प्रोजेक्ट ज़्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में पर्यावरण को बहाल करने के लिए एक अहम ब्लूप्रिंट है.
इस प्रोजेक्ट की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे फिर से जीवित करने की पूरी प्रक्रिया ज़ीरो लागत पर हो रही है, क्योंकि इसमें कोई पूंजीगत लागत नहीं लग रही है. अभी इस प्रक्रिया में सिर्फ़ JCB मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है और त्सो कार झील को पूरी तरह से बहाल होने में 1 साल (अक्टूबर 2027) लगेगा.
“भारत की भविष्य की सुरक्षा के लिए पर्यावरण बहाली के माननीय प्रधानमंत्री @narendramodi जी के विज़न से प्रेरित यह प्रोजेक्ट, त्सो कार को एक साल के भीतर उसकी पुरानी शान में वापस लाने की क्षमता रखता है. इस पहल से अहम चरागाहों को बहाल करके स्थानीय समुदायों की आजीविका में भी सुधार होने की उम्मीद है, ताकि हमारे पश्मीना चरवाहे आखिरकार घर लौट सकें,” एलजी सक्सेना ने कहा.
खास बात यह है कि त्सो कार झील को फिर से जीवित करने का स्थानीय समुदायों की आजीविका पर भी बड़ा असर पड़ेगा. त्सो कार झील के आस-पास रहने वाले ज़्यादातर ग्रामीण पश्मीना बकरी चरवाहे हैं, और झील के सिकुड़ने के साथ ही चरागाह. पश्मीना बकरियों के चरने की जगहें भी खत्म हो गई हैं. इस वजह से पश्मीना पालने वालों को चरागाहों की तलाश में अपने घरों से 50 से 75 किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है. इस झील के फिर से बनने से घास के मैदान बनेंगे, स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के मौके पैदा होंगे और चरवाहे भी अपने घरों को लौट सकेंगे.
अधिकारियों को भरोसा है कि इस तरह के वैज्ञानिक, टिकाऊ और कम लागत वाले उपाय लंबे समय तक जलवायु के प्रति मज़बूती, पर्यावरण की सुरक्षा, और पानी व खेती से जुड़ी खुशहाली की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होंगे.
