राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने Gen Z को बड़ा संदेश दिया है. उन्होंने उज्जैन में शुक्रवार (18 सितंबर) को कहा कि युवा धर्म संसद जब सुना तो बहुत खुश हुआ. क्योंकि युवा आजकल धर्म की बात नहीं करते हैं. आजकल ऐसी बातें सुनने को कम ही मिलती हैं.
भागवत ने कहा, ”जब भी धर्म पर चर्चा होती है, लोग कहते हैं कि यह बुढ़ापे की चीज है. गीता और रामायण को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाली किताबें माना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है. यह धर्म अस्तित्व की शुरुआत से लेकर अंत तक बना रहता है, और सब कुछ उसी के अनुसार चलता है. आप इसमें विश्वास करें या न करें. कुछ चीजें नियमों से चलती हैं. सूरज का अस्तित्व है, और आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते. अगर आप इसमें विश्वास नहीं करते, तो यह आपकी मर्जी है, लेकिन उसका उगना और डूबना तय है.”
लोगों को गलतफहमी हो जाती है- मोहन भागवत
उन्होंने कहा, ”जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर यह मानता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और उसकी इच्छा के अनुसार होना चाहिए, तो उसे यह गलतफहमी हो जाती है कि चीजें वैसी ही होंगी जैसा वह चाहता है, लेकिन ऐसा नहीं है.”
जब मुझे उद्घाटन भाषण देना था, तो मेरे मन में कई विचार आ रहे थे कि मुझे क्या कहना चाहिए. मैं धर्म का विशेषज्ञ नहीं हूं.
सृष्टि की शुरूआत से धर्म है और रहेगा- भागवत
मोहन भागवत ने कहा, ”धर्म ऐसी कल्पना है कि अन्वेषण करने में पूरा जीवन चला जाए. ऊहापोह करने से पहले अपना मन खाली होना चाहिए. धर्म को समझने के लिए जो सीख कर आया है उसे पहले खाली होना चाहिए. मेरे लिए मेरा धर्म मेरे जन्म से निश्चित है, मृत्यु तक रहेगा. सृष्टि की शुरूआत से धर्म है और आखिर तक धर्म रहेगा.”
उन्होंने कहा, ”रिश्ते और संबंध पहले भी थे और आगे भी रहेगें. धर्म से जीवन का सारा सुख है और उसी से मोक्ष है. किसी भी परिस्थिति में धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए.”
भागवत ने सेकुलरिज्म पर कहा कि धर्म शब्द का अर्थ पता नहीं, हम अपनी भाषा भूल गए. पाश्चात्य जगत रिलिजन को धर्म समझ बैठा. रिलिजन धर्म नहीं है.”
